भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 421 में से

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पृष्ठ 279

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय से पहले जिन्हें पौरुष से अन्न ग्रहण करने का अधिकार है, वे देवगण अपने पौरुष से अन्न ग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि उस अन्न को पचा कर वायु रूप में सैकड़ों गुना फैला देते हैं. कांख, कमर, गुप्तांग तथा अन्य अंगों को हानि न हो. वे अंग पुष्ट हों. हे होता! सब के कल्याण हेतु यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४४ ) होता यक्षदिन्द्रमृषभस्य हविष ऽ आवयदद्य मध्यतो मेद ऽ उद्धृतं पुरा द्वेषोभ्यः पुरा पौरुषेय्या गृभो घसन्नूनं घासे अत्राणां यवसप्रथमाना १७ सुमतक्षराणा १७ शतरुद्रियाणामग्निष्वात्तानां पीवोपवसनानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ उत्साद्तो ऽ ङ्गादङ्गादवत्तानां करदेवमिन्द्रो जुषता १७ हविर्होतर्यज.. (४५) आज होता ने इंद्र देव हेतु ऋषभ के बीच के भाग से यज्ञ किया. द्वेषियों से पहले जिन्हें पौरुष से अन्न ग्रहण करने का अधिकार है, वे देवगण अपने पौरुष से अन्न ग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि उस अन्न को पचा कर वायु रूप में सैकड़ों गुना फैला देते हैं. कांख, कमर, गुप्तांग तथा अन्य अंगों को हानि न हो. वे अंग पुष्ट हों. हे होता! सब के कल्याण हेतु यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४५ ) होता यक्षद्वनस्पतिमभि हि पिष्टतमया रभिष्ठया रशनयाधित. यत्राश्विनोश्छागस्य हविषः प्रिया धामानि यत्र सरस्वत्या मेषस्य हविषः प्रिया धामानि यत्रेन्द्रस्य ऋषभस्य हविषः प्रिया धामानि यत्राग्नेः प्रिया धामानि यत्र सोमस्य प्रिया धामानि यत्रेन्द्रस्य सुत्राम्णः प्रिया धामानि यत्र सवितुः प्रिया धामानि यत्र वरुणस्य प्रिया धामानि यत्र वनस्पतेः प्रिया पाथा १७ सि यत्र देवानामाज्यपानां प्रिया धामानि यत्राग्नेर्होतुः प्रिया धामानि तत्रैतान्रस्तुत्येवोपस्तुत्येवोपावस्त्रक्ष्दभीयस ऽ इव कृत्वी करदेवं देवो वनस्पतिर्जुषता १७ हविर्होतर्यज.. (४६) होता ने वनस्पति देव के लिए यज्ञ किया. बंधे हुए पशु की भांति वनस्पति अपने स्थान पर रहने ( स्थिर ) की कृपा करें. जहां छाग की हवि अश्विनीकुमार का प्रिय धाम है, जहां मेष की हवि सरस्वती देवी का प्रिय धाम है, जहां ऋषभ की हवि इंद्र देव का प्रिय धाम है, जहां अग्नि का प्रिय धाम है, जहां सोम का प्रिय धाम है, जहां सुरक्षक इंद्र देव का प्रिय धाम है, जहां सविता देव का प्रिय धाम है, जहां वरुण देव का प्रिय धाम है, जहां वनस्पति देव का प्रिय धाम है, जहां घी की हवि पीने वाले का प्रिय धाम है, जहां अग्नि होता हैं, उन का प्रिय धाम है, वहां प्रस्तुत और अप्रस्तुत हो कर देवगण उत्तम हवि ग्रहण करते हैं. आप भी ऐसा ही यज्ञ कीजिए. ( ४६ ) होता यक्षदग्नि १७ स्विष्टकृतमयाडग्निरश्विनोश्छागस्य हविषः प्रिया धामान्ययाट् सरस्वत्या मेषस्य हविषः प्रिया धामान्ययाडिन्द्रस्य ऋषभस्य हविषः प्रिया धामान्ययाडग्नेः प्रिया धामान्ययाट् सोमस्य प्रिया धामान्ययाडिन्द्रस्य सुत्राम्णः प्रिया धामान्ययाट् सवितुः प्रिया धामान्ययाड् वरुणस्य प्रिया धामान्ययाड् वनस्पतेः प्रिया पाथा १७ स्ययाड् देवानामाज्यपानां यजुर्वेद - २७९