भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 421 में से

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पृष्ठ 315

उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक ऽ आसीत्. स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१०) जो प्रथम जन्मा है, हिरण्यगर्भ में रहा, जो उत्पन्न हुई पीढ़ियों का एकमात्र पालक है, जो पृथ्वीलोक और स्वर्गलोक को धारता है, उस देव के अलावा किस देव के लिए हवि का विधान करें. ( १० ) यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक ऽ इन्द्राजा जगतो बभूव. य ऽ ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (११) जो अपने प्राणपण से पल भर में इस जगत् का महिमावान शासक हुआ, जो दोपायों और चौपायों का ईश्वर है, महिमावान हम उस देवता के अलावा और किस देवता के लिए हवि का विधान करें ? ( ११ ) यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्र १४ रस्या सहाहुः. यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१२) जिन की इस महिमा से हिमवान पर्वतों का निर्माण हुआ, जिस ने यह रसीले समुद्र निर्मित किए, जिन की भुजाएं दसों दिशाओं में फैली हुई हैं, हम उस देवता के अलावा और किस देवता के लिए हवि का विधान करें ? ( १२ ) य ऽ आत्मदा बलदा यस्य विश्व ऽ उपासते प्रशिषं यस्य देवाः. यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१३) जो आत्मशक्ति दाता और बलशक्ति दाता हैं, सारा विश्व जिस की प्रशंसा करता है, सारा विश्व जिस की उपासना करता है, जिस की छत्रच्छाया अमृत सरीखी सुखदायी है, जिस के बिना मृत्यु जैसा कष्ट होता है, उस के अलावा हम और किस देव के लिए हवि का विधान करें. ( १३ ) आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोदब्धासो अपरीतास ऽ उद्भिदः. देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे.. (१४) हम यज्ञ में सब ओर से अबाध रूप से कल्याणकारी व दुर्लभ परिणाम प्राप्त करें. सभी देवगण प्रतिदिन हमारी रक्षा व बढ़ोत्तरी करें. ( १४ ) देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवाना १४ रतिरभि नो निवर्त्तताम्. देवाना १४ सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न ऽ आयुः प्रतरन्तु जीवसे.. (१५) देवगणों की उत्तम बुद्धि हमारे लिए कल्याणकारिणी हो. देवगणों की सरलता हमारे लिए कल्याणकारिणी हो. देवगणों का दान हमारे लिए अनुकूल हो. देवगणों की मित्रता हम को मिले. हम उस मित्रता से लाभ पाएं. हम देवताओं से दीर्घ आयु प्राप्त कर जीएं. ( १५ ) यजुर्वेद - ३१५