भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32

पूर्वार्ध पहला अध्याय सा विश्वायुः सा विश्वकर्मा सा विश्वधायाः. इन्द्रस्य त्वां भाग ꣳ सोमेनातनच्मि विष्णो हव्य ꣳ रक्ष.. (४) हे मनुष्यो! वह (सविता देव की कृपा) पूर्ण आयु देने वाली है. सभी कर्म करने में समर्थ है. सभी को धारण करने की शक्ति रखती है. इंद्र के भाग में सोमरस मिला कर हवि तैयार करते हैं. विष्णु हवि की रक्षा करने की कृपा करें. (४) अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्. इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि.. (५) हे अग्नि! आप संकल्पशील हैं. आप हमें भी व्रतशील बनाने की कृपा कीजिए. आप की कृपा से हम यह धन (व्रत रूपी) और असत्य से सत्य को पा सकें. (५) कस्त्वा युनक्ति स त्वा युनक्ति कस्मै त्वा युनक्ति तस्मै त्वा युनक्ति. कर्मणे वां वेषाय वाम्.. (६) हे मनुष्यो! किस ने आप को नियुक्त किया है? किसलिए आप को नियुक्त किया गया है ? परमेश्वर ने आप को नियुक्त किया है. श्रेष्ठ कर्म में नियुक्त किया है. (६) प्रत्युष्ट ꣳ रक्षः प्रत्युष्टा ऽ अरातयो निष्टप्त ꣳ रक्षो निष्टप्ता ऽ अरातयः. उर्वन्तरिक्षमन्वेमि.. (७) हे मनुष्यो! आप यज्ञ और उस के साधनों की रक्षा कीजिए. निकृष्ट राक्षस नष्ट हो गए हैं. अन्य विकार भी समाप्त हो गए हैं. अब हवि आदि अंतरिक्ष में पहुंचने वाली वस्तुएं (बिना बाधा के) अंतरिक्ष में जाने की कृपा करें. (७) धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योस्मान्धूर्वति तं धूर्व यं वयं धूर्वामः. देवानामसि वह्नितम ꣳ सस्नितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम्.. (८) हे परमेश्वर! आप सामर्थ्यवान हैं. आप अपनी सामर्थ्य से धूर्तों का नाश कीजिए. जो हम सभी को दुःख पहुंचाते हैं. आप उन पापियों और दुष्टात्माओं का नाश कीजिए जिन का सभी नाश करना चाहते हैं. आप देवों में सर्वाधिक तेजस्वी, शक्तिदाता, पूर्णतादायी और देवताओं को आमंत्रित करने वाले हैं. (८) अहुतमसि हविर्धानं दृ ꣳ हस्व मा ह्वार्मा ते यज्ञपतिर्ह्वार्षीत्. विष्णुस्त्वा क्रमतामुरु वातायापहत ꣳ रक्षो यच्छन्तां पञ्च.. (९) हे मनुष्यो! आप देव शक्ति धारण कर सकते हैं. आप हवि धारण करते हैं. आप दृढ़ हैं. आप और आप के यज्ञ के सहयोगी किसी के प्रति कठोर न बनें. विष्णु व विशाल वायुमंडल (पर्यावरण) आप पर कृपा करें. आप की पंचेंद्रियां श्रेष्ठ कार्यों में लगें. (९) ३२ - यजुर्वेद 632/2