यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तीसवां अध्याय को, असमृद्धि हेतु स्वप्नजीवी को, पीड़ा से मुक्ति के लिए सावधान करने वाले को, उन्नति ( बढ़ोतरी ) हेतु अभिमान रहित को, बाण निशाने पर साधने के लिए लक्ष्य साधक को नियुक्त करना चाहिए. ( १७ ) अक्षराजाय कितवं कृतायादिनवदर्शं त्रेतायै कल्पिनं द्वापरायाधिकल्पिन मास्कन्दाय सभास्थाणुं मृत्यवे गोव्यच्छमन्तकाय गोघातं क्षुधे यो गां विकृन्तन्तं भिक्षमाण ऽ उपतिष्ठति दुष्कृताय चरकाचार्यं पाप्मने सैलग्म्.. (१८) जुआ खेलने के लिए द्यूतकार, क्रियाशील हेतु समीक्षा करने वाले, त्रेता के लिए कल्पनाकार, द्वापर हेतु अकल्पनाकार की नियुक्ति की जानी चाहिए. आक्रमण जैसी स्थिति में स्थिर मति वाला ठीक रहता है. मृत्यु की स्थिति में इंद्रियों का अनुकरण कर्ता ठीक रहता है. यमराज हेतु गौ घाती, भूख हेतु भीख मांगने वाले, पाप के निवारण के लिए चरकाचार्य और दुष्टों के लिए कठोर दंड दे सकने वाले की नियुक्ति की जानी चाहिए. ( १८ ) प्रतिश्रुत्काया ऽ अर्तनं घोषाय भषमन्ताय बहुवादिनमनन्ताय मूक १७ शब्दायाडम्बराघातं महसे वीणावादं क्रोशाय तूणवध्म मवरस्पराय शङ्खध्मं वनाय वनपमन्यतोरण्याय दावपम्.. (१९) प्रतिज्ञा के लिए उस को निबाह सकने वाले की नियुक्ति की जानी चाहिए. योजना के लिए उद्घोषक को, विवाद निर्णय हेतु चुप रहने वालों को, बहुवादी हेतु आडंबर का आघात करने वाले को, महिमा हेतु वीणावादक को, भीषण स्वर के लिए ढोल बजाने वाले को, ठीकठीक आवाज हेतु शंख वादक को, वन रक्षार्थ वन रक्षक को, अन्य वनों की रक्षा के लिए दावानल रक्षक को नियुक्त करना चाहिए. ( १९ ) नर्माय पुँश्चलू १७ हसाय कारिं यादसे शाबल्यां ग्रामण्यं गणकमभिक्रोशकं तान्महसे वीणावादं पाणिघ्नं तूणवध्मं तान्नृत्तायानन्दाय तलवम्.. (२०) मनोरंजन हेतु पुरुषों के पीछे चलने वाली, हंसाने में नक्काल, जल जंतुओं को मारने में नीच जाति वालों की नियुक्ति की जानी चाहिए. स्वागतसत्कार के लिए ग्रामीण ज्योतिषी और व्यवहार कुशल व्यक्ति की नियुक्ति की जानी चाहिए. नृत्य हेतु वीणावादक, तालवादक और स्वरवादक की नियुक्ति की जानी चाहिए. आनंद हेतु तालीवादक की नियुक्ति की जानी चाहिए. ( २० ) अग्नये पीवानं पृथिव्यै पीठसर्पिणं वायवे चाण्डालमन्तरिक्षाय व १७ शनर्तिनं दिवे खलति १७ सूर्याय हर्यक्षं नक्षत्रेभ्यः किर्मिरं चन्द्रमसे किलासमह्रे शुक्लं पिङ्गाक्ष १७ रात्र्यै कृष्णं पिङ्गाक्षम्.. (२१) आग से जुड़े कार्य हेतु पुष्ट को, पृथ्वी के लिए आसन पर बैठने वाले को, यजुर्वेद - ३५१