यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय का आह्वान करते हैं. हम सभी देवों से रक्षा साधनों सहित पधारने का अनुरोध करते हैं. ( ४९ ) अस्मे रुद्रा मेहना पर्वतासो वृत्रहत्ये भरहूतौ सजोषा:. य: श १७ सते स्तुवते धायि पप्र ऽ इन्द्रज्येष्ठा अस्माँ २ अवन्तु देवा:.. (५०) यजमान हेतु मेह ( वर्षा ) बरसाने वाले, वृत्रासुर का नाश करने वाले, शत्रुओं को रुलाने वाले, पर्वतवासी इंद्र देव हमारा भरणपोषण व हमारी रक्षा करने की कृपा करें. इंद्र देव वरिष्ठ हैं. उन की हम स्तुति करते हैं. उन की हम उपासना करते हैं. वे हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ५० ) अर्वाञ्चो अद्या भवता यजत्रा आ वो हार्दि भयमानो व्येयेम्. त्राध्वं नो देवा निजुरो वृकस्य त्राध्वं कर्तादवपदो यजत्रा:.. (५१) हे देवगण! आप हमारा कल्याण व हमारे यज्ञ की रक्षा कीजिए. आज आप हमारे निकट पधारिए. हम डरे हुए यजमानों के हृदय में प्रेम भाव भरिए. आप बुरे कामों व बुरे लोगों से हमारी रक्षा कीजिए. ( ५१ ) विश्वे अद्य मरुतो विश्व ऽ ऊती विश्वे भवन्त्वग्नय: समिद्धा:. विश्वे नो देवा ऽ अवसा गमन्तु विश्वमस्तु द्रविणं वाजो अस्मे.. (५२) आज हमारे इस यज्ञ में मरुद्गण सब की रक्षा के लिए पधारने की कृपा करें. अग्नि व विश्व हमारी रक्षा के लिए पधारने की कृपा करें. समिधाओं से इंद्र देव बढ़ोतरी पाएं. सभी देव हमें बल प्रदान करें. सभी देव हमें अन्न व धन प्रदान करने की कृपा करें. ( ५२ ) विश्वे देवा: शृणुतेम १७ हवं मे ये अन्तरिक्षे य ऽ उप द्यवि ष्ठ. ये अग्निजिह्वा ऽ उत वा यजत्रा ऽ आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयध्वम्.. (५३) सभी देव हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. जो देव अंतरिक्ष लोक में हैं, जो देव स्वर्गलोक में हैं, वे देव भी हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. अग्निमुख वाले देव हमारी दी हुई हवि को स्वीकार करने की कृपा करें. यज्ञ में हम ने कुश के आसन उन के लिए बिछाए हैं. वे कृपया उस पर विराजें. ( ५३ ) देवेभ्यो हि प्रथमं यज्ञियेभ्योऽमृतत्व १७ सुवसि भागमुत्तमम्. आदिद्दामान १७ सवितर्व्यूर्णुषेऽनूचीना जीविता मानुषेभ्य:.. (५४) हे सविता देव! आप देवताओं में प्रथम हैं. आप यज्ञ करने वालों को अमृत और उत्तम सौभाग्य प्रदान करते हैं. वे फिर ( अंतरिक्ष में ) अपनी किरणों का विस्तार करते हैं. मनुष्यों के जीवन के लिए वे यत्न करते हैं. ( ५४ ) प्र वायुमच्छा बृहती मनीषा बृहद्रयिं विश्ववार १७ रथप्राम्. ३७६ - यजुर्वेद