भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 421 में से

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पृष्ठ 380

उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक में अग्नि को यजमान धारण करते हैं. अग्नि सब को प्रकाशित करते हैं. यज्ञ के लिए हम अग्नि का वरण करते हैं. जैसे घोड़ा सब ओर विचरता है, वैसे ही अग्नि सब ओर विचरते हैं. ( ७५ ) उक्थेभिर्वृत्रहन्तमा या मन्दाना चिदा गिरा. आङ्गूषैराविवासतः.. (७६) हे इंद्र देव! आप वृत्रासुर नाशक व आनंददाता हैं. हम श्रेष्ठ उक्थों ( मंत्रों ) से आप की आराधना करते हैं. ( ७६ ) उप नः सूनवो गिरः शृण्वन्त्वमृतस्य ये. सुमृडीका भवन्तु नः.. (७७) हम आप के पुत्र हैं. अमर देवता हमारी वाणियां सुनने व हमारे प्रति कल्याणकारी होने की कृपा करें. ( ७७ ) ब्रह्माणि मे मतयः शं ष्ठ सुतासः शुष्म ऽ इयर्ति प्रभृतो मे अद्रिः. आ शासते प्रति हर्यन्त्युक्थेमा हरी वहतस्ता नो अच्छ.. (७८) आप के पुत्रों की बुद्धि सुखदायी है. हम ने पत्थरों से कूट कर सोमरस निचोड़ा है. आप अपने हरे घोड़ों को साधिए, जोतिए और यहां पधारने की कृपा कीजिए. हम आप के लिए उक्थ मंत्र गाते हैं. ( ७८ ) अनुत्तमा ते मघवन्नकिर्नु न त्वावाँ २ अस्ति देवता विदानः. न जायमानो नशते न जातो यानि करिष्या कृणुहि प्रवृद्ध.. (७९) हे इंद्र देव! आप से अधिक उत्तम कोई नहीं है. आप से ज्यादा धनवान, आप से ज्यादा कोई देवता विद्वान् नहीं है. आप जैसा कोई न उत्पन्न हुआ है, न ही उत्पन्न होगा. आप जैसे कार्य भी न किसी ने किए हैं, न करेंगे. ( ७९ ) तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ ऽ उग्रस्त्वेषनृम्णः. सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यं विश्वे मदन्त्यूमाः.. (८०) इंद्र देव भुवनों में ज्येष्ठ, उग्र व शत्रुनाशक हैं. यज्ञ में रक्षा करने वाले सभी देवगण उन को प्रसन्न करते हैं. संसार में इंद्र देव सब का कल्याण करते हैं. ( ८० ) इमा ऽ उ त्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम. पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितोभि स्तोमैरनूषत.. (८१) हे देवगण! आप बहुत धनवान हैं. आप हमारी वाणी की बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. आप अग्नि जैसे वर्ण ( रंग ) वाले और पवित्र हैं. हम आप को सर्वविध जानना चाहते हैं. हम सर्वविध आप की स्तुति कर रहे हैं. ( ८१ ) यस्यायं विश्व ऽ आर्यो दासः शेवधिपा अरिः. तिरश्चिदर्ये रुशमे पवीरवि तुभ्येत्सो अज्यते रयिः.. (८२) ३८० - यजुर्वेद