यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 398, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध पैंतीसवां अध्याय क्रव्यादमग्निं प्र हिणोमि दूरं यमराज्यं गच्छतु रिप्रवाहः. इहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्.. (१९) हम क्रव्याद् अग्नि को दूर करते हैं. हम उस से दूर यमराज्य में जाने का निवेदन करते हैं. सर्वज्ञ अग्नि हमारे घरों में होने वाले यज्ञ में बढ़ोतरी पाएं. अग्नि हमारी हवि को वहन करने व उसे देवताओं तक पहुंचाने की कृपा करें. (१९) वह वपां जातवेदः पितृभ्यो यत्रैनान्वेत्थ निहितान् पराके. मेदसः कुल्या ऽ उप तान्तस्रवन्तु सत्या ऽ एषामाशिषः सं नमन्ता ᳵ स्वाहा.. (२०) हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. आप जहां पितर निवास करते हैं, आप उस स्थान को जानते हैं. अतः आप हम से दूर पितरलोकवासी पितरों के लिए हवि वहन करने की कृपा करें. पितरों के पास जल की धाराएं स्रवित होने की कृपा करें. पितरों के आशीर्वाद हमारे प्रति सधे हों. हम पितरों को नमन करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. (२०) स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी. यच्छा नः शर्म सप्रथाः. अप नः शोशुचदघम्.. (२१) हे पृथ्वी देवी! आप हमारे वास योग्य होने की कृपा कीजिए. आप हमारे लिए सुख प्रदान कीजिए. आप हमें कष्ट मुक्त कीजिए. आप हमारे पापों को हम से दूर करने व हमें पवित्र बनाने की कृपा कीजिए. (२१) अस्मात्त्वमधि जातोसि त्वदयं जायतां पुनः. असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा.. (२२) हे अग्नि! आप यजमान द्वारा उपजाए जाते हैं. फिर बारबार यजमान द्वारा उपजाए जाते हैं. यह यजमान स्वर्ग के व लोक के लिए यज्ञ संपादित करते हैं. हे अग्नि! आप के लिए स्वाहा. (२२) ३९८ - यजुर्वेद