यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 411, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय विशेष यज्ञ को पवित्र करने वाले पितरों, पृथ्वीलोक, स्वर्गलोक और दूसरे सभी देवताओं के लिए ये आहुतियां समर्पित हैं. ( १५ ) स्वाहा रुद्राय रुद्रहूतये स्वाहा सं ज्योतिषा ज्योतिः. अहः केतुना जुषता ᳵ सुज्योतिर्ज्योतिषा स्वाहा. रात्रिः केतुना जुषता ᳵ सुज्योतिर्ज्योतिषा स्वाहा. मधु हुतमिन्द्रतमे अग्नावश्याम ते देव घर्म नमस्ते अस्तु मा मा हि ᳵ सीः.. ( १६) हे दिव्य गुण वाली परम शक्ति! यह आहुति रुद्र देव को समर्पित है. ज्योति से ज्योति प्रज्वलित करने के लिए यह आहुति समर्पित है. दिन में तेज से तेज को संयुक्त करने के लिए यह आहुति हैं. रात में तेज से तेज को संयुक्त करने के लिए यह आहुति समर्पित है. आप इन आहुतियों को स्वीकार करते हुए हमारी रक्षा करें. ( १६ ) अभीमं महिमा दिवं विप्रो बभूव सप्रथाः. उत श्रवसा पृथिवी ᳵ स ᳵ सीदस्व महाँ २ असि रोचस्व देववीतमः. वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम्.. (१७) हे अग्नि! आप का यश पृथ्वी और स्वर्ग में फैला है. आप प्रज्वलित हो कर सभी देवताओं को तृप्त करते हुए लाल रंग वाला आकर्षक धुआं चारों ओर फैलाएं. ( १७ ) या ते घर्म दिव्या शुग्या गायत्र्या ᳵ हविर्धाने. सा त ऽ आप्यायतां निष्प्यायतां तस्यै ते स्वाहा. या ते घर्मान्तरिक्षे शुग्या त्रिष्टुब्भ्याग्नीध्रे. सा त ऽ आ प्यायतां निष्प्यायतां तस्यै ते स्वाहा. या ते घर्म पृथिव्या ᳵ शुग्या जगत्या ᳵ सदस्या. सा त ऽ आ प्यायतां निष्प्यायतां तस्यै ते स्वाहा.. ( १८) हे अग्नि! आप की चमक स्वर्गलोक, विशेष यज्ञ और गायत्री छंद में फैली है. वह चमक अंतरिक्ष तथा त्रिष्टुप् छंद में भी विद्यमान है. आप की वही चमक पृथ्वी, सभास्थल और जगती छंद में भी है. आप की चमक या यश और भी अधिक फैले इसी उद्देश्य से यह आहुति समर्पित है. ( १८ ) क्षत्रस्य त्वा परस्पाय ब्रह्मणस्तन्वं पाहि. विशस्त्वा धर्मणा वयमनु क्रामाम सुविताय नव्यसे.. (१९) हे परम शक्ति! आप शत्रुओं से हमारी रक्षा करें. क्षत्रियों के बल तथा ब्राह्मणों के ज्ञान की रक्षा करें. प्रजा को धर्म मार्ग पर चलाएं. उत्तम पदार्थ प्रदान करें. श्रेष्ठ मार्ग पर चलने तथा कर्तव्य पालन के लिए हम आप का अनुसरण करते हैं. ( १९ ) यजुर्वेद - ४११