यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 45, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध दूसरा अध्याय हे अग्नि! आप व्रतपति हैं. हम भी आप के व्रतों के अनुसार चल कर सामर्थ्यवान बनते हैं. आप ने हमारी आकांक्षाएं फलीभूत की हैं. हम जैसे यज्ञ करते समय थे ( यज्ञफल प्राप्त हो जाने पर भी ) हम वैसे ही हैं. ( २८ ) अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा सोमाय पितृमते स्वाहा. अपहता ऽ असुरा रक्षा १७ सि वेदिषदः.. ( २९ ) पितरों के लिए आहुति पहुंचाने वाले अग्नि के लिए स्वाहा. पितरों के साथी सोम के लिए स्वाहा. यज्ञ की वेदी से असुर और राक्षसगण दूर हो गए हैं. ( २९ ) ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना ऽ असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति. परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टाँल्लोकात्प्रणुदात्यस्मात्.. ( ३० ) जो असुर रूप बदल कर या अन्य रूप में आ कर पितरों के लिए अर्पित आहुति को खा जाते हैं, आप इस तरह अपना भरणपोषण करने वाले नीच कार्य करने वाले राक्षसों को लोक से दूर करने की कृपा कीजिए. ( ३० ) अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्. अमीमदन्त पितरो यथाभागमावृषायिषत.. ( ३१ ) जैसे बैल अपना भाग प्राप्त कर के मदमस्त हो जाते हैं, पुष्ट हो जाते हैं, वैसे ही पितृगण अपना भाग पा कर पुष्ट एवं मदमस्त हो जाते हैं. ( ३१ ) नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरः शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वास ऽ आधत्त.. ( ३२ ) पितरों के रस रूप को नमन. पितरों के शुष्क रूप को नमन. पितरों के जीवन रूप को नमन. पितरों के अन्न रूप को नमन. पितरों के पोषक रूप को नमन. पितरों के उत्साह रूप को नमन. पितरों के क्रोध रूप को नमन. पितरों के मन्यु रूप को नमन. हम पितरों को घर, वस्त्र आदि समर्पित करते हैं. पितर भी हमारे लिए घर, वस्त्र आदि धारण करने की कृपा करें. ( ३२ ) आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम्. यथेह पुरुषोसत्.. ( ३३ ) हे पितृगण! आप गर्भ में ही बालक के लिए अजस्र ( भरपूर ) पोषण प्रदान करने की कृपा कीजिए जिस से वह वीर बन सके. ( ३३ ) ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिस्रुतुम्. स्वधा स्थ तर्पयत मे पितॄन्.. ( ३४ ) ऊर्जा वहन करने वाली व ऊर्जामयी करने वाली, दूधमयी तथा अन्नमयी करने वाली जलधाराएं पितरों को तृप्त करने की कृपा करें. ( ३४ ) यजुर्वेद - ४५