यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध तीसरा अध्याय और भरणपोषण करने वाले हैं. आप जल में प्राणदायी शक्ति डालते हैं व जीवों को जिलाते हैं. ( १२ ) उभा वामिन्द्राग्नी आहुवध्या उभा राधसः सह मादयध्यै. उभा दाताराविषा १७ं रयीणामुभा वाजस्य सातये हुवे वाम्.. (१३) हे इंद्र! हे अग्नि! हम यजमान आप दोनों देवताओं को यज्ञ में आमंत्रित करते हैं. हम आप दोनों को आहुति भेंट करते हैं. हम आप की आराधना करते हैं. आप अन्नधनसहित हमें मदमस्त बनाइए. आप अन्न और धन के दाता हैं. हम आप दोनों को ही अन्न और धन पाने के लिए यज्ञ में आमंत्रित करते हैं. ( १३ ) अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः. तं जानन्नग्न ऽ आरोहाथा नो वर्धया रयिम्.. (१४) हे अग्नि! आप बारबार उत्पन्न होने वाले हैं. इसलिए यज्ञ की समाप्ति पर आप पुनः गृहस्थ के यहां जन्म लें अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल प्रकट हों. बाद में पुनः यज्ञ के लिए हमें समृद्ध करें. ( १४ ) अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः. यमप्नवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभ्वं विशेविशे.. (१५) हे अग्नि! आप प्रथम हैं. आप देवताओं को आमंत्रित करते हैं. आप यज्ञवान हैं. यज्ञ में पुरोहितों द्वारा आप की उपासना और स्थापना की जाती है. आप को आप्नवान और भृगु आदि ऋषियों ने समय-समय पर वनों में प्रज्वलित किया. आप विलक्षण हैं. ( १५ ) अस्य प्रत्नामनु द्युत १४ं शुक्रं दुदुहे अह्रयः. पयः सहस्रासामृषिम्.. (१६) अग्नि देव चिरकाल से हैं. हम उन की कांति का अनुसरण करना चाहते हैं. यजमान ने दूध, दही आदि हवि की सामग्री से हजारों यज्ञ करने वाले ऋषियों की भांति दूध दुहा है. ( १६ ) तनूपा ऽ अग्नेसि तन्वं मे पाह्यायुर्दा ऽ अग्नेस्यायुर्मे देहि वर्चोदा ऽ अग्नेसि वर्चो मे देहि. अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म ऽ आपृण.. (१७) हे अग्नि! आप पुरोहित के तन के रक्षक हैं. आप हमारे भी तन की रक्षा करने की कृपा कीजिए. हे अग्नि! आप आयु देने वाले हैं. आप हमें ( दीर्घ ) आयु प्रदान करने की कृपा कीजिए. हे अग्नि! आप वर्चस्व ( प्रभाव ) प्रदाता हैं. आप हमें वर्चस्व प्रदान करने की कृपा कीजिए. हे अग्नि! आप हमारे शरीर की न्यूनता ( कमियां ) दूर कर के उसे पूर्ण करने की कृपा कीजिए. ( १७ ) इन्धानास्त्वा शत १७ं हिमा द्युमन्त १७ं समिधीमहि. ४८ - यजुर्वेद 632/3