भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 421 में से

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पृष्ठ 50

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय हे अग्नि! आप प्रकाशमान हैं. आप यज्ञों में शोभित होते हैं. आप स्वर्गलोक को भी प्रकाशित करते हैं. आप गोपति व अमर हैं. आप स्वयं यज्ञ में बढ़ोत्तरी पाते हैं. हम उपासना से आप के पास आते हैं. ( २३ ) स नः पितेव सूनवेग्ने सूपायनो भव. सचस्वा नः स्वस्तये.. (२४) हे अग्नि! आप यजमानों के पास उसी तरह बने रहें जैसे पिता पुत्र के पास बना रहता है. आप हम यजमानों के कल्याण के लिए सदैव यजमानों के पास रहने की कृपा कीजिए. ( २४ ) अग्ने त्वं नो अन्तम ऽ उत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः. वसूरग्निर्वसुश्रवा ऽ अच्छा नक्षि द्युमत्तम १७ रयिं दाः.. ( २५) हे अग्नि! आप हमारे पास हैं. आप पालक, रक्षक, कल्याणकारी व भावी पीढ़ियों के दाता हैं. आप घर दाता, विश्वविख्यात, धन और कीर्तिदाता हैं. हमारी आंख के तारे व धनदाता हैं. ( २५ ) तन्त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः. स नो बोधि श्रुधी हवमुरुष्याणो अघायतः समस्मात्.. (२६) हे अग्नि! आप पवित्रतम हैं. आप स्वर्गलोक को भी प्रकाशित करने वाले हैं. आप से हम अपने अच्छे मन के लिए कामना करते हैं. आप से हम अच्छे मित्रों के लिए इच्छा करते हैं. आप पापियों से हमें बचाइए. आप हमें जागृत कीजिए. आप हमारा निवेदन सुनिए. ( २६ ) इड ऽ एह्यदित ऽ एहि काम्या ऽ एत. मयि वः कामधरणं भूयात्.. (२७) हे इड़ा देवी! व हे अदिति देवी! आप यहां पधारिए. आप यहां पधारने की इच्छा कीजिए. हे इच्छित गौ! आप हमारी इच्छाओं को पूरा करने के लिए यहां पधारिए. ( २७ ) सोमान १७ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते. कक्षीवन्तं य ऽ औशिजः.. (२८) हे ब्रह्मणस्पति! आप सोम का सेवन करने वालों को प्रकाशमान कीजिए. जैसे उशीज के पुत्र कक्षीवान को आप ने महिमावान बनाया, वैसे ही आप हमें भी महिमावान बनाने की कृपा कीजिए. ( २८ ) यो रेवान्यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्द्धनः. स नः सिषक्तु यस्तुरः.. ( २९) हे ब्रह्मणस्पति! आप रोगहारी, धनवान, ऐश्वर्यदाता, पुष्टिवर्धक व जल्दी काम समाप्त करने वाले हैं. आप हमारे पास पधारने की कृपा कीजिए. ( २९) मा नः श १७ सो अरुषो धूर्तिः प्रणङ् मर्त्यस्य. रक्षा णो ब्रह्मणस्पते.. (३०) ५० - यजुर्वेद