यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध चौथा अध्याय आप चित्त ( मन ) के पति ( स्वामी ) हैं. आप हमें पवित्र कीजिए. आप वाणी के स्वामी हैं. आप हमें पवित्र बनाइए. दोष ( छिद्रों ) से रहित सविता देव हमें पवित्र करने की कृपा करें. सूर्य अपनी किरणों से हमें पवित्र बनाएं. हे पवित्रपति ! हम आप के पुत्र हैं. हम पवित्र हो कर अपनी मनोकामना पूर्ण करें, ताकि हम और अधिक यज्ञ करने योग्य हो सकें. ( ४ ) आ वो देवास ऽ ईमहे वामं प्रत्यध्वरे. आ वो देवास ऽ आशिषो यज्ञियासो हवामहे.. (५) हे देवताओ! हम इस यज्ञ के आरंभ में अपनी इच्छापूर्ति के लिए आप को आमंत्रित करते हैं. हे देवताओ! हम याज्ञिक ( यज्ञ करने वाले ) आशीर्वाद और यज्ञ फल की प्राप्ति के लिए आप का आह्वान करते हैं. ( ५ ) स्वाहा यज्ञं मनसः स्वाहोरोरन्तरिक्षात्स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या ᳪ स्वाहा वातादारभे स्वाहा.. (६) हे यज्ञ देव! हम मन से यज्ञ करते हैं. उन के लिए स्वाहा. अंतरिक्षलोक, स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक के लिए स्वाहा. हम वायु को यज्ञ के आरंभ में ही आहुति अर्पित करते हैं. ( ६ ) आकूत्यै प्रयुजेग्नये स्वाहा मेधायै मनसेग्नये स्वाहा दीक्षायै तपसेग्नये स्वाहा सरस्वत्यै पूष्णेग्नये स्वाहा. आपो देवीर्बृहतीर्विश्वशम्भुवो द्यावापृथिवी उरो अन्तरिक्ष. बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा.. (७) अग्नि यज्ञ के संकल्प की प्रेरणा देने वाले हैं. उन के लिए स्वाहा. अग्नि यज्ञ की बुद्धि देते हैं. यज्ञ करने में मन को प्रेरित करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. दीक्षा और तप की सिद्धि हेतु अग्नि को यह आहुति दी जाती है. सरस्वती देवी के लिए स्वाहा. पूषा देव के लिए स्वाहा. अग्नि के लिए स्वाहा. हे जल देव! आप के लिए स्वाहा. संसार के पालक शंभु देव के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक के लिए स्वाहा. पृथ्वीलोक के लिए स्वाहा. विशाल अंतरिक्षलोक के लिए स्वाहा. हम बृहस्पति के लिए हवि समर्पित करते हैं. उन के लिए स्वाहा. ( ७ ) विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरी॑त सख्यम्. विश्वो राय ऽ इषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा.. (८) सविता देव सभी देवों का नेतृत्व करने वाले हैं. वे वरेण्य ( श्रेष्ठ ) गुणों वाले हैं. हम उन की मित्रता पाना चाहते हैं. हम उन से सभी प्रकार के वैभव चाहते हैं. हम सब के लिए उन से धन प्राप्ति की चाह रखते हैं. हम स्वर्गदायी वैभव ( यशस्वी ) चाहते हैं. हम प्रजा का पोषण करने के लिए धन चाहते हैं. सविता देव के लिए स्वाहा. ( ८ ) यजुर्वेद - ५७