भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 421 में से

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पृष्ठ 68

पूर्वार्ध पांचवां अध्याय दिशा में पहुंचाते हैं. देवगण यज्ञ को फलीभूत करते हैं. देवगण यज्ञ को ऊंचाई पर पहुंचाते हैं. आगे गायों के बाड़े में (गोशाला में) घोषणा करने की कृपा करें कि देवता यजमान को आयु प्रदान करने की कृपा करें. देवता यजमान को निंदित न होने दें. देवता यजमान को सुखपूर्वक रहने का आशीर्वाद प्रदान करते हैं. देवगण पृथ्वी के इन स्थानों पर सुख से वास करने की कृपा करें. (१७) विष्णोर्नुकं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजा ᳪ सि. यो अस्कभायद॒त्तर ᳪ सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा.. (१८) हम यजमान विष्णु के अनुकरणीय कार्यों पराक्रमपूर्ण कार्यों का वर्णन करते हैं. उन की चरणरज में पृथ्वी आदि लोक वास करते हैं. वे हमें भयमुक्त करते हैं. वे लोकों को साधने वाले व सर्वव्यापक हैं. हम उन की प्रसन्नता के लिए हैं. काष्ठ देव आप की स्थापना करते हैं. (१८) दिवो वा विष्ण ऽ उत वा पृथिव्या महो वा विष्ण ऽ उरोरन्तरिक्षात्. उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वा प्रयच्छ दक्षिणादोत सव्याद्विष्णवे त्वा.. (१९) हे विष्णु! आप स्वर्गलोक से हमें धन दें या हे विष्णु! आप पृथ्वीलोक से हमें धन से पूर्ण करें या हे विष्णु! आप विशाललोक से हमें धन दें या हे विष्णु! आप धन से पूर्ण करें या हे विष्णु! आप अपने दोनों हाथों से हमें धन से पूर्ण करें या हे विष्णु! आप दाएं या बाएं हाथ से हमें धन दे कर पूर्ण करें. विष्णु की प्रसन्नता के लिए हम काष्ठ देव को स्थापित करते हैं. (१९) प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः. यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा.. (२०) विष्णु अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं. वे अपनी वीरता के कारण स्तुत्य हैं. वे सिंह व संवेग की तरह विचरण करते हैं वे पर्वत में वास करते हैं. इन के तीनों पैरों में सब आश्रय पाए हुए हैं. इन विष्णु के तीनों पैरों में सब लोक आश्रय पाए हुए हैं. (२०) विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्त्रे स्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोध्रुवोसि. वैष्णवमसि विष्णवे त्वा.. (२१) हे विष्णु! आप ललाट हैं. आप ललाट के दोनों भाग हैं. विष्णु सभी लोकों को व्यापक बनाते हैं. आप स्थिर हैं. आप ध्रुव हैं. हम विष्णु की प्रसन्नता के लिए काष्ठ देव की स्थापना करते हैं. (२१) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽ श्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आ ददे नार्यसी दमह ᳪ रक्षसां ग्रीवा अपिकृन्तामि. बृहन्नसि बृहद्रवा बृहतीमिन्द्राय वाचं वद.. (२२) ६८ - यजुर्वेद