भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 421 में से

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पृष्ठ 76

पूर्वार्ध छठा अध्याय ग्रहण करते हैं. अग्नि व सोम देव की संतुष्टि के लिए यज्ञ करते हैं. ओषधियां और जल शुद्धता का अनुकरण करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) माता अनुमति प्रदान करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) पिता अनुमति प्रदान करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) भाई अनुमति प्रदान करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) मित्र अनुमति प्रदान करें. हम अग्नि की संतुष्टि के लिए यज्ञ करते हैं. हम सोम की संतुष्टि के लिए यज्ञ करते हैं. ( ९ ) अपां पेरुरस्यापो देवीः स्वदन्तु स्वात्तं चित्सद्देवहविः. सन्ते प्राणो वातेन गच्छता १४ समङ्गानि यजत्रैः सं यज्ञपतिराशिषा.. (१०) हे यज्ञ से जुड़े पशु देव! आप जल के रक्षक व दिव्य गुणों वाले हैं. आप सदैव हविमय रहने की कृपा करें. देव कृपा से यज्ञपति को आशीर्वाद मिले. हमारे प्राण वायु से भरे रहें. हम यज्ञीय अनुशासन का पालन करें. ( १० ) घृतेनाक्तौ पशूँस्त्रायेथा १४ रेवति यजमाने प्रियं धा ऽ आ विश. उरोरन्तरिक्षात्सजूर्देवेन वातेनास्य हविषस्तमना यज समस्य तन्वा भव. वर्षो वर्षीयांसि यज्ञे यज्ञपतिं धाः स्वाहा देवेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा.. (११) हे यज्ञ देव! आप घी आदि ( हवि हेतु उपयोगी ) देने वाले पशुओं की रक्षा करने की कृपा करें. यजमान के लिए ये पशु प्रिय हों. उन के प्रिय धाम में वास करें. ये पशु यजमान के अनुकूल हों. यजमान की रक्षा करने की कृपा कीजिए. इस यज्ञ में हवि से उस का विस्तार करने की कृपा करें. यज्ञपति बरसों तक जीएं. वे कल्याण करें. देवताओं के लिए स्वाहा. ( ११ ) माहिर्भूर्मा पृदाकुर्नमस्त ऽ आतानान्वर्वा प्रेहि. घृतस्य कुल्या ऽ उप ऋतस्य पथ्या ऽ अनु.. (१२) हे यज्ञ देव! आप महान् हैं. आप यजमानों के प्रति हिंसक मत होना. आप महान् हैं. आप यजमानों के प्रति निर्दय मत होना. आप महान् हैं. आप यजमानों के प्रति क्रोधित मत होना. आप की कृपा से घी जल की भांति बहे. हम सत्य के पथ का अनुसरण करें. ( १२ ) देवीरापः शुद्धा वोढ्व १४ सुपरिविष्टा देवेषु सुपरिविष्टा वयं परिवेष्टारो भूयास्म.. (१३) हे देवियो! आप शुद्ध हैं. आप प्राकृतिक रूप से शुद्ध हैं. आप देवताओं के लिए हवि वहन करने की कृपा करें. हवि उत्तम पात्र में है. आप उसे ग्रहण करने की कृपा कीजिए. इन की कृपा से हम भी कार्य करने वाले हों. ( १३ ) वाचं ते शुन्धामि प्राणं ते शुन्धामि चक्षुस्ते शुन्धामि श्रोत्रं ते शुन्धामि नाभिं ते शुन्धामि मेढ्रं ते शुन्धामि पायुं ते शुन्धामि चरित्राँस्ते शुन्धामि.. (१४) हे याजक! हम यजमान आप की वाणी को शुद्ध करते हैं. यजमान आप के ७६ - यजुर्वेद