भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 421 में से

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पृष्ठ 79

पूर्वार्ध छठा अध्याय पूर्ण करें. अग्नि की ज्योति और भस्म अंतरिक्षलोक को परिपूर्ण करें. इन अग्नि के लिए स्वाहा. (२१) मा ऽ पो मौषधीर्हि ᳵषी र्धाम्नो धाम्नो राजँस्ततो वरुण नो मुञ्च. यदाहुरघ्न्या ऽ इति वरुणेति शपामहे ततो वरुण नो मुञ्च. सुमित्रिया न ऽ आप ऽ ओषधयः सन्तु दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु यो ऽ स्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः.. (२२) यज्ञ में स्थित जल व ओषधि को अपनी जगह से मत हटाइए. यज्ञ में स्थित आप ओषधि को अपने स्थान पर रहने दीजिए. इन दोनों को वहीं सुशोभित होने दीजिए. वरुण देव हमें न छोड़ें. जो न मारने योग्य हैं, हम उन का वध न करें. हम वरुण देव की कृपा से शाप और पाप से मुक्त रहें. वे हमें न छोड़ें. जल और ओषधियां हमारी अच्छी मित्र हों. जिन से हम द्वेष रखते हैं, उन का नाश हो. जो हम से द्वेष रखते हैं, उन का नाश हो. (२२) हविष्मतीरिमा ऽ आपोहविष्माँ २ आ विवासति. हविष्मान् देवो अध्वरो हविष्माँ २ अस्तु सूर्यः.. (२३) जल वाली नदियां हविष्मती हों. जल हविष्मान हो. देव हविष्मान हों. यज्ञ हविष्मान हो. सूर्य हविष्मान हो. (२३) अग्नेर्वोपन्नगृहस्य सदसि सादयामीन्द्राग्न्योर्भागधेयी स्थ मित्रावरुणयोर्भागधेयी स्थ विश्वेषां देवानां भागधेयी स्थ. अमूर्या ऽ उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह. ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्.. (२४) अग्नि देवताओं तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे इंद्र देव तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे मित्र देव तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे वरुण देव तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे सभी देवों तक हवि भाग पहुंचाते हैं. भाप बना कर जो जल सूर्य ऊपर बहुत समय तक साथ रखते हैं, उस जल से हमारे यज्ञ को सफल बनाने की कृपा करें. (२४) हृदे त्वा मनसे त्वा दिवे त्वा सूर्याय त्वा. ऊर्ध्वमिममध्वरं दिवि देवेषु होत्रा यच्छ.. (२५) हे देवगण! आप हृदय, मन, स्वर्ग और सूर्य में हैं. आप यज्ञ को ऊंचा उठाएं. यजमान को दिव्यता दें. यजमान को स्वर्ग दें.(२५) सोम राजन् विश्वास्त्वं प्रजा ऽ उपावरोह विश्वास्तवां प्रजा ऽ उपावरोहन्तु. शृणोत्वग्निः समिधा हवं मे शृण्वन्त्वापो धिषणाश्च देवीः. श्रोता ग्रावाणो विदुषो न यज्ञ ᳵँ शृणोतु देवः सविता हवं मे स्वाहा.. (२६) हे सोम! आप सब के राजा हैं. आप प्रजा पर अनुग्रह करने की कृपा करें. अग्नि यजुर्वेद - ७९