यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सातवां अध्याय उपयाम में ग्रहण किया है. आप को इंद्र देव की तृप्ति हेतु कलश में ग्रहण किया है. आप को अग्नि की तृप्ति हेतु कलश में ग्रहण किया है, कलश आप दोनों का मूल स्थान है. आप यज्ञशाला में निर्धारित स्थान पर विराजने की कृपा कीजिए. हम श्रेष्ठ वाणियों से आप की उपासना करते हैं. आप यज्ञ में अपना भाग स्वीकार कीजिए. ( ३१ ) आ घा ये ऽ अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्. येषामिन्द्रो युवा सखा. उपयामगृहीतोस्यग्नीन्द्राभ्यां त्वैष ते योनिरग्नीन्द्राभ्यां त्वा.. (३२) हे सोम! आप को इंद्र देव व अग्नि की तृप्ति हेतु विधिवत ग्रहण किया गया है. यज्ञस्थल में आप दोनों देवों का कुश का आसन निर्धारित है. इंद्र आप के मित्र हैं. वे युवा हैं. सोम को इंद्र देव और अग्नि दोनों के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप ही इंद्र और अग्नि दोनों का मूल स्थान हैं. ( ३२ ) ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास ऽ आगत. दाश्वां ᳵ सो दाशुषः सुतम्. उपयामगृहीतोसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (३३) विश्व देव यज्ञ में पधारने की कृपा करें. वे यजमानों के संरक्षक व यजमानों के पालक हैं. वे हम सब के अनुरोध पर यज्ञशाला में सोमरस का पान करने के लिए पधारने की कृपा करें. सोमरस को विश्व देव की वृत्ति के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यह आप का मूल स्थान है. आप सभी देवताओं के लिए यहां स्थिर होने की कृपा कीजिए. ( ३३ ) विश्वे देवास ऽ आगत शृणुता म इम ᳵ हवम्. एदं बर्हिनिषीदत. उपयामगृहीतोसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (३४) हे विश्व देव! आप हमारी प्रार्थनाएं सुनिए. आप पधारने की कृपा कीजिए. हम आप से यहां कुश के आसन पर बैठने का अनुरोध करते हैं. आप उस आसन पर विराजने की कृपा कीजिए. आप को सभी देवताओं के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यही आप का और देवताओं का मूल स्थान है. ( ३४ ) इन्द्र मरुत्व ऽ इह पाहि सोमं यथा शार्याते ऽ अपिबः सुतस्य. तव प्रणीती तव शूर शर्मन्ना विवासन्ति कवयः सुयज्ञाः. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. (३५) हे इंद्र देव! हे मरुद् देव! आप सोम की रक्षा कीजिए. जैसे आप ने शर्याति के यज्ञ में सोमरस पीने की कृपा की, वैसे ही आप इस यज्ञ में पधारिए और सोमरस ९० - यजुर्वेद