यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सातवां अध्याय हे इंद्र! आप महान्, व्यापक, सर्वज्ञ, मनोकामना पूरक हैं. आप अपने सहयोगी देवों के साथ यज्ञ में पधारने व हमारा द्रव्य व पराक्रम बढ़ाने की कृपा कीजिए. आप हमारे कर्म विशाल बनाने की कृपा कीजिए. आप कर्मों के पोषक हैं. आप को महान् इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ३९ ) मँहाँ २ ऽ इन्द्रो य ऽ ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमां २ ऽ इव. स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे. उपयामगृहीतोसि महेन्द्राय त्वैष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा.. (४०) हे इंद्र देव! आप महान् और जल वर्षक हैं. आप हम पर ओज बरसाइए. आप उपासक यजमानों की बढ़ोतरी करते हैं. आप को महान् इंद्र देव के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ४० ) उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्य ४ स्वाहा.. (४१) सूर्य सर्वज्ञ और दिव्य किरणें वहन करते हैं. वे अपनी किरणों की पताका फहराते हैं. वे प्राणीमात्र को दुनिया दिखाते हैं. उन के लिए स्वाहा. ( ४१ ) चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः. आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष १५ सूर्य ऽ आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा.. (४२) मित्र देव वरुण देव और अग्नि देवता के नेत्र हैं. स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक तथा अंतरिक्षलोक में सूर्य प्रकाश फैलाते हैं. सूर्य जगत् की आत्मा हैं. इन सब देवों के लिए स्वाहा. सूर्य मित्र देव के नेत्र हैं. वे वरुण देव के नेत्र हैं. वे अग्नि के नेत्र हैं. वे देवताओं के नेत्र हैं. वे स्वर्गलोक को अपने प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं. वे पृथ्वीलोक को अपने प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं. वे अंतरिक्ष को अपने प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं. वे जगत् की आत्मा हैं. उन सूर्य के लिए स्वाहा. ( ४२ ) अग्ने नय सुपथा राये ऽ अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्. युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम स्वाहा.. (४३) हे अग्नि! आप हमें अच्छे पथ की ओर ले जाइए और धन प्रदान कीजिए. आप हमें अच्छा विद्वान् बनाइए. आप हम से बुराइयों को दूर कीजिए. हम बारबार आप को नमन करते हैं. हम बारबार आप के लिए प्रार्थना करते हैं. आप के लिए स्वाहा. आप हमें सुपथ पर ले चलिए. आप हमें धन दीजिए. ( ४३ ) अयं नो ऽ अग्निर्वरिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर ऽ एतु प्रभिन्दन्. अयं वाजाञ्जयतु वाजसातावय १४ शत्रूञ्जयतु जर्हषाणः स्वाहा.. (४४) हे अग्नि! हमारे दुश्मनों का भेद दीजिए व उन को हरा दीजिए. हमारे दुश्मनों के ९२ - यजुर्वेद