भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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तृतीय अध्याय ७३ बन्धनकारी कर्म है, न कि मोक्षद कर्म। वस्तुतः यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। अब यज्ञ न बताकर पहले यह बताते हैं कि यज्ञ आया कहाँ से?- सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥१०॥ प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञसहित प्रजा को रचकर कहा कि इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ। यह यज्ञ तुमलोगों की 'इष्टकामधुक्'- जिसमें अनिष्ट न हो, विनाशरहित इष्ट-सम्बन्धी कामना की पूर्ति करेगा। यज्ञसहित प्रजा को किसने रचा? प्रजापति ब्रह्मा ने। ब्रह्मा कौन? क्या चार मुख और आठ आँखोंवाला देवता, जैसा कि प्रचलित है? नहीं, श्रीकृष्ण के अनुसार देवता नाम की कोई अलग सत्ता है ही नहीं। फिर प्रजापति कौन है? वस्तुतः जिसने प्रजा के मूल उद्गम परमात्मा में प्रवेश पा लिया है, वह महापुरुष प्रजापति है। उसकी बुद्धि ही ब्रह्मा है- 'अहंकार सिव बुद्धि अज, मन ससि चित्त महान।' (रामचरितमानस, ६/१५ क) उस समय बुद्धि यन्त्रमात्र होती है। उस पुरुष की वाणी में परमात्मा ही बोलता है। भजन की वास्तविक क्रिया प्रारम्भ हो जाने पर बुद्धि का उत्तरोत्तर उत्थान होता है। प्रारम्भ में वह बुद्धि ब्रह्मविद्या से संयुक्त होने के कारण 'ब्रह्मविद्' कही जाती है। क्रमशः विकारों का शमन होने पर, ब्रह्मविद्या में श्रेष्ठ होने पर वह 'ब्रह्मविद्वर' कही जाती है। उत्थान और सूक्ष्म हो जाने पर बुद्धि की अवस्था विकसित हो जाती है। वह 'ब्रह्मविद्वरीयान्' कहलाती है। उस अवस्था में ब्रह्मविद्वेत्ता पुरुष दूसरों को भी उत्थान मार्ग पर लाने का अधिकार प्राप्त कर लेता है। बुद्धि की पराकाष्ठा है- 'ब्रह्मविद्वरिष्ठ' अर्थात् ब्रह्मविद् की वह अवस्था, जिसमें इष्ट प्रवाहित है। ऐसी स्थितिवाले महापुरुष प्रजा के मूल उद्गम परमात्मा में प्रविष्ट और स्थित रहते हैं। ऐसे महापुरुषों की बुद्धि मात्र यंत्र है। वे ही प्रजापति कहलाते हैं। वे प्रकृति के द्वन्द्व का विश्लेषण कर 'आराधना-क्रिया' की रचना करते हैं। यज्ञ के अनुरूप संस्कारों का देना ही प्रजा की रचना है। इससे पूर्व समाज अचेत एवं अव्यवस्थित रहता है। सृष्टि अनादि है। संस्कार