भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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तृतीय अध्याय ८१ श्रीकृष्ण कहते हैं- यदि मैं सावधान होकर आराधना में लगा न रहूँ तो वर्णसंकर का कर्त्ता होऊँ। वस्तुतः आत्मा का शुद्ध वर्ण है परमात्मा। अपने शाश्वत स्वरूप के पथ से भटक जाना वर्णसंकरता है। यदि स्वरूपस्थ महापुरुष क्रिया में नहीं बरतते तो लोग उनके अनुकरण से क्रियारहित हो जायेंगे, आत्मपथ से भटक जायेंगे, वर्णसंकर हो जायेंगे। वे प्रकृति में खो जायेंगे। स्त्रियों का सतीत्व एवं नस्ल की शुद्धता एक सामाजिक व्यवस्था है, अधिकारों का प्रश्न है, समाज के लिये उसकी उपयोगिता भी है; किन्तु माता- पिता की भूलों का सन्तान की साधना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 'आपन करनी पार उतरनी।' हनुमान, व्यास, वशिष्ठ, नारद, शुकदेव, कबीर, ईसा इत्यादि अच्छे महापुरुष हुए, जबकि सामाजिक कुलीनता से इनका सम्पर्क नहीं है। आत्मा अपने पूर्वजन्म के गुणधर्म लेकर आता है। श्रीकृष्ण कहते हैं- 'मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।' (१५/७)- मनसहित इन्द्रियों से जो कार्य इस जन्म में होता है, उनके संस्कार लेकर जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर नवीन शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसमें जन्मदाताओं का क्या लगा? उनके विकास में कोई अन्तर नहीं आया। अतः स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर नहीं होता। स्त्रियों के दूषित होने और वर्णसंकर से कोई सम्बन्ध नहीं है। शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर न होकर प्रकृति में बिखर जाना ही वर्णसंकरता है। यदि महापुरुष सावधान होकर क्रिया (नियत कर्म) में बरतते हुए लोगों से क्रिया न कराये तो वह उस सारी प्रजा का हनन करनेवाला, मारनेवाला बने। साधना-क्रम में चलकर उस मूल अविनाशी की प्राप्ति ही जीवन है और प्रकृति में बिखरे रहना, भटक जाना ही मृत्यु है। किन्तु वह महापुरुष इस सारी प्रजा को यदि क्रिया-पथ पर नहीं चलाता, इस सारी प्रजा को बिखराव से रोककर सत्पथ पर नहीं चलाता तो वह सारी प्रजा का हनन करनेवाला हत्यारा है, हिंसक है और क्रमशः चलते हुए जो चला लेता है वह शुद्ध अहिंसक है। गीता के अनुसार शरीरों का निधन, नश्वर कलेवरों का निधन मात्र परिवर्तन है, हिंसा नहीं।