भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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१०० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता यह अवतार किसी भाग्यवान् साधक के अन्तराल में होता है। आप प्रकट होकर करते क्या हैं?- परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८॥ अर्जुन ! 'साधूनां परित्राणाय' - परमसाध्य एकमात्र परमात्मा है, जिसे साध लेने पर कुछ भी साधना शेष नहीं रह जाता। उस साध्य में प्रवेश दिलानेवाले विवेक, वैराग्य, शम, दम इत्यादि दैवी सम्पद् को निर्विघ्न प्रवाहित करने के लिये तथा 'दुष्कृताम्' - जिनसे दूषित कार्यरूप लेते हैं उन काम, क्रोध, राग, द्वेषादि विजातीय प्रवृत्तियों को समूल नष्ट करने के लिये तथा धर्म को भली प्रकार स्थिर करने के लिये मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। युग का तात्पर्य सत्ययुग, त्रेता या द्वापर नहीं, युगधर्मों का उतार-चढ़ाव मनुष्यों के स्वभाव पर है। युगधर्म सदैव रहते हैं। मानस में संकेत है- नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।। ( रामचरितमानस, ७/१०३ ख/१ ) युगधर्म सभी के हृदय में नित्य होते रहते हैं। अविद्या से नहीं बल्कि विद्या से, राममाया की प्रेरणा से हृदय में होते हैं। जिसे प्रस्तुत श्लोक में आत्ममाया कहा गया है, वही है राममाया। हृदय में राम की स्थिति दिला देनेवाली राम से प्रेरित है वह विद्या। कैसे समझा जाय कि अब कौन-सा युग कार्य कर रहा है, तो 'सुद्ध सत्व समता बिज्ञाना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।।' ( रामचरितमानस, ७/१०३ख/२ ) जब हृदय में शुद्ध सत्त्वगुण ही कार्यरत हो, राजस तथा तामस दोनों गुण शान्त हो जायें, विषमताएँ समाप्त हो गयी हों, जिसका किसी से द्वेष न हो, विज्ञान हो अर्थात् इष्ट से निर्देशन लेने और उस पर टिकने की क्षमता हो, मन में प्रसन्नता का पूर्ण संचार हो- जब ऐसी योग्यता आ जाय तो सत्ययुग में प्रवेश मिल गया। इसी प्रकार दो अन्य युगों का वर्णन किया और अन्त में- तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।। ( रामचरितमानस, ७/१०३ ख/५ )