भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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११२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता दिखायी भर पड़ता है। वस्तुतः वह करता-धरता कुछ नहीं, इसलिये पाप को प्राप्त नहीं होता। वह पूर्णत्व को प्राप्त है, इसीलिये आवागमन को प्राप्त नहीं होता। यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥२२॥ अपने आप जो कुछ भी प्राप्त हो उसी में सन्तुष्ट रहनेवाला, सुख-दुःख, राग-द्वेष और हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से परे, ‘विमत्सरः’- ईर्ष्यारहित तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाववाला पुरुष कर्मों को करके भी नहीं बँधता। सिद्धि अर्थात् जिसे पाना था वह अब भिन्न नहीं है और वह कभी विलग भी नहीं होगा, इसलिये असिद्धि का भी भय नहीं है। इस प्रकार सिद्धि और असिद्धि में समभाववाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बँधता। कौन-सा कर्म वह करता है? वही नियत कर्म यज्ञ की प्रक्रिया। इसी को दोहराते हुए कहते हैं- गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३॥ अर्जुन! ‘यज्ञायाचरतः कर्म’- यज्ञ का आचरण ही कर्म है और साक्षात्कार का नाम ही ज्ञान है। इस यज्ञ का आचरण करके साक्षात्कार के साथ ज्ञान में स्थित, संगदोष और आसक्ति से रहित मुक्त पुरुष के सम्पूर्ण कर्म भली प्रकार विलीन हो जाते हैं। वे कर्म कोई परिणाम उत्पन्न नहीं कर पाते; क्योंकि कर्मों का फल परमात्मा उनसे भिन्न नहीं रह गया। अब फल में कौन- सा फल लगेगा? इसलिये उन मुक्त पुरुषों को अपने लिये कर्म की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। फिर भी लोकसंग्रह के लिये वे कर्म करते ही हैं और करते हुए भी वे इन कर्मों में लिप्त नहीं होते। जब करते हैं तो लिप्त क्यों नहीं होते? इस पर कहते हैं- ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥२४॥ ऐसे मुक्त पुरुष का समर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, अग्नि भी ब्रह्म ही है अर्थात् ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूपी कर्त्ता द्वारा जो हवन किया जाता है वह भी