भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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१३४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता 'योगयुक्त' अर्थात् योग के परिणाम को प्राप्त पुरुष, जो सब प्राणियों के आत्मा के मूल परमात्मा में स्थित है, ऐसा योगी कर्म के फल को त्यागकर (कर्मों का फल परमात्मा उससे भिन्न नहीं है, इसलिये अब कर्मफल को त्यागकर) 'नैष्ठिकीम् शान्तिम् आप्नोति'– शान्ति की अन्तिम अवस्था को प्राप्त होता है, जिसके आगे कोई शान्ति शेष नहीं है, जिसके पश्चात् वह कभी अशान्त नहीं होगा। किन्तु अयुक्त पुरुष, जो योग के परिणाम से युक्त नहीं है, अभी रास्ते में है ऐसा पुरुष फल में आसक्त हुआ (फल है परमात्मा, उसमें उसका आसक्त होना आवश्यक है। इसलिये फल में आसक्त होने पर भी) 'कामकारेण निबध्यते'–कामना करके बँध जाता है अर्थात् पूर्तिपर्यन्त कामनाएँ जागृत होती हैं, अतः साधक को पूर्तिपर्यन्त सावधान रहना चाहिये। 'महाराज जी' कहा करें– “हो ! तनिकौ हम अलग, भगवान अलग हैं तो माया कामयाब हो सकती है।” कल ही प्राप्ति होनी हो किन्तु आज तो वह अज्ञानी ही है। अतः पूर्तिपर्यन्त साधक को असावधान नहीं होना चाहिये। इसी पर आगे देखें– सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।१३।। जो सम्पूर्ण रूप से स्ववश है, जो शरीर, मन, बुद्धि और प्रकृति से परे स्वयं में स्थित है, ऐसा वशी पुरुष निःसन्देह न कुछ करता है न कराता है। पीछेवालों से कराना भी उसकी आन्तरिक शान्ति का स्पर्श नहीं कर पाता। ऐसा स्वरूपस्थ पुरुष शब्दादि विषयों को उपलब्ध करानेवाले नौ द्वारों (दो कान, दो नेत्र, दो नासिका छिद्र, एक मुख, उपस्थ एवं पायु) वाले शरीररूपी घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर स्वरूपानन्द में ही स्थित रहता है। यथार्थतः वह न कुछ करता है और न कराता है। इसी को पुनः श्रीकृष्ण दूसरे शब्दों में कहते हैं कि वह प्रभु न करता है, न कराता है। सद्गुरु, भगवान, प्रभु, स्वरूपस्थ महापुरुष, युक्त इत्यादि एक– दूसरे के पर्याय हैं। अलग से कोई भगवान कुछ करने नहीं आता। वह जब करता है तो इन्हीं स्वरूपस्थ इष्ट के माध्यम से कराता है। महापुरुष के लिये शरीर एक मकान मात्र है। अतः परमात्मा का करना और महापुरुष का करना एक ही बात है; क्योंकि वह उनके द्वारा है। वस्तुतः वह पुरुष करते हुए भी