यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठम अध्याय १४७ जिसकी दृष्टि में मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण एक समान हैं- ऐसा योगी 'युक्त' कहा जाता है। 'युक्त' का अर्थ है योग से संयुक्त। यह योग की पराकाष्ठा है, जिसे योगेश्वर पाँचवें अध्याय में श्लोक सात से बारह तक चित्रित कर आये हैं। परमतत्त्व परमात्मा का साक्षात्कार और उसके साथ होनेवाली जानकारी ज्ञान है। एक इञ्च भी इष्ट से दूरी है, जानने की इच्छा बनी है, तब तक वह अज्ञानी है। वह प्रेरक कैसे सर्वव्याप्त है? कैसे प्रेरणा देता है? कैसे अनेक आत्माओं का एक साथ पथ-प्रदर्शन करता है? कैसे वह भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञाता है? उस प्रेरक इष्ट की इस कार्य-प्रणाली का ज्ञान ही 'विज्ञान' है। जिस दिन से हृदय में इष्ट का आविर्भाव होता है, उसी दिन से वह निर्देश देने लगता है; किन्तु प्रारम्भ में साधक समझ नहीं पाता। पराकाष्ठाकाल में ही योगी उसकी आन्तरिक कार्य-प्रणाली को पूर्णतः समझ पाता है। यही समझ विज्ञान है। योगारूढ़ अथवा युक्तपुरुष का अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त रहता है। इसी प्रकार योगयुक्त पुरुष की स्थिति का निरूपण करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण पुनः कहते हैं- सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥ प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष समदर्शी और समवर्ती होता है। जैसे पिछले अध्याय (५/१८) में उन्होंने बताया कि जो पूर्णज्ञाता या पण्डित है, वह विद्या- विनयसम्पन्न ब्राह्मण में, चाण्डाल में, गाय-कुत्ता-हाथी में समान दृष्टिवाला होता है- उसी का पूरक यह श्लोक है। वह हृदय से सहायता करनेवाले सुहृदय, मित्र, बैरी, उदासीन, द्वेषी, बन्धुगणों, धर्मात्मा तथा पापियों में भी समान दृष्टिवाला योगयुक्त पुरुष अतिश्रेष्ठ है। वह उनके कार्यों पर दृष्टि नहीं डालता बल्कि उनके भीतर आत्मा के संचार पर ही उसकी दृष्टि पड़ती है। इन सबमें वह केवल इतना ही अन्तर देखता है कि कोई कुछ नीचे की सीढ़ी पर खड़ा है, तो कोई निर्मलता के समीप; किन्तु वह क्षमता सबमें है। यहाँ योगयुक्त के लक्षण पुनः दोहराये गये। कोई योगयुक्त कैसे बनता है? वह कैसे यज्ञ करता है? यज्ञस्थली कैसी हो? आसन कैसा हो? उस समय कैसे बैठा जाय? कर्त्ता के द्वारा पालन किये