यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जायेगा और प्रकृति भी उस ब्रह्म के ही अन्तर्गत है, प्रकृति में विचरण करना ब्रह्म के बाहर नहीं है; किन्तु श्रीकृष्ण के अनुसार यह गलत है। गीता में इन मान्यताओं का किंचित् भी स्थान नहीं है। श्रीकृष्ण का कथन है कि मन जहाँ- जहाँ जाय, जिन माध्यमों से जाय, उन्हीं माध्यमों से रोककर परमात्मा में ही लगावें। मन का निरोध सम्भव है। इस निरोध का परिणाम क्या होगा?- प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्।।२७।। जिसका मन पूर्णरूपेण शान्त है, जो पाप से रहित है, जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे ब्रह्म से एकीभूत योगी को सर्वोत्तम आनन्द प्राप्त होता है, जिससे उत्तम कुछ भी नहीं है। इसी पर पुनः बल देते हैं- युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः। सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।२८।। पापरहित योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर उस परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति के अनन्त आनन्द की अनुभूति करता है। वह 'ब्रह्मसंस्पर्श' अर्थात् ब्रह्म के स्पर्श और प्रवेश के साथ अनन्त आनन्द का अनुभव करता है। अतः भजन अनिवार्य है। इसी पर आगे कहते हैं- सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।२९।। योग के परिणाम से युक्त आत्मावाला, सबमें समभाव से देखनेवाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण प्राणियों में व्याप्त देखता है और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में ही प्रवाहित देखता है। इस प्रकार देखने से लाभ क्या है?- यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।३०।। जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में मुझ परमात्मा को देखता है, व्याप्त देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ परमात्मा के ही अन्तर्गत देखता है, उसके लिये मैं