यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११॥ सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वररूप मेरे परमभाव को न जाननेवाले मूढ़लोग मुझे मनुष्य-शरीर के आधारवाला और तुच्छ समझते हैं। सम्पूर्ण प्राणियों के ईश्वरों का भी जो महान् ईश्वर है, उस परमभाव में मैं स्थित हूँ; किन्तु हूँ मनुष्य-शरीरधारी, मूढ़लोग इसे नहीं जानते। वे मुझे मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। उनका दोष भी क्या है? जब वे दृष्टिपात करते हैं तो महापुरुष का शरीर ही तो दिखायी पड़ता है। कैसे वे समझें कि आप महान् ईश्वरभाव में स्थित हैं? वे क्यों नहीं देख पाते? इस पर कहते हैं- मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२॥ वे वृथा आशा (जो कभी पूर्ण न हो ऐसी आशा), वृथा कर्म (बन्धनकारी कर्म), वृथा ज्ञान (जो वस्तुतः अज्ञान है), 'विचेतसः'- विशेष रूप से अचेत हुए, राक्षसों और असुरों के-से मोहित होनेवाले स्वभाव को धारण किये होते हैं अर्थात् आसुरी स्वभाववाले होते हैं इसलिये मनुष्य समझते हैं। असुर और राक्षस मन का एक स्वभाव है, न कि कोई जाति या योनि। आसुरी स्वभाववाले मुझे नहीं जान पाते; किन्तु महात्माजन मुझे जानते और भजते हैं- महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३॥ परन्तु हे पार्थ! दैवी प्रकृति अर्थात् दैवी सम्पद् के आश्रित हुए महात्माजन मुझे सब भूतों का आदिकारण, अव्यक्त और अक्षर जानकर अनन्य मन से अर्थात् मन के अन्तराल में किसी अन्य को स्थान न देकर केवल मुझमें श्रद्धा रखकर निरन्तर मुझे भजते हैं। किस प्रकार भजते हैं? इस पर कहते हैं- सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४॥ वे निरन्तर चिन्तन के व्रत में अचल रहते हुए मेरे नाम और गुणों का चिन्तन करते हैं, प्राप्ति के यत्न करते हैं और मुझे बारम्बार नमस्कार करते हुए