यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम अध्याय २०५ प्रस्तुत अध्याय नौ के तेईस से पचीसवें श्लोक तक योगेश्वर श्रीकृष्ण पुनः दोहराते हैं कि- अर्जुन! जो श्रद्धा से अन्य-अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे मुझे ही पूजते हैं; किन्तु वह पूजन अविधिपूर्वक है। वहाँ देवता नाम की सक्षम वस्तु नहीं है। उनकी प्राप्ति की विधि गलत है। अब प्रश्न उठता है कि जब वे भी प्रकारान्तर से आपको ही पूजते हैं और फल भी मिलता ही है, तो दोष क्या है? अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।।२४।। सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता अर्थात् यज्ञ जिसमें विलय होते हैं, यज्ञ के परिणाम में जो मिलता है वह मैं हूँ और स्वामी भी मैं ही हूँ; परन्तु वे मुझे तत्त्व से भली प्रकार नहीं जानते, इसलिये 'च्यवन्ति'- गिरते हैं। अर्थात् वे कभी अन्य देवताओं में गिरते हैं और तत्त्व से जब तक नहीं जानते तब तक कामनाओं से भी गिरते हैं। उनकी गति क्या है?- यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।२५।। अर्जुन! देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं। देवता हैं तो परिवर्तित सत्ता, वे अपने सद्कर्मानुसार जीवन व्यतीत करते हैं। पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं अर्थात् अतीत में उलझे रहते हैं, भूतों को पूजनेवाले भूत होते हैं- शरीर धारण करते हैं और मेरा भक्त मुझे प्राप्त होता है। वह मेरा साक्षात् स्वरूप होता है। उसका पतन नहीं होता। इतना ही नहीं, मेरी पूजा का विधान भी सरल है- पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।२६।। भक्ति का आरम्भ यहीं से है कि पत्र, पुष्प, फल, जल इत्यादि जो कोई मुझे भक्तिपूर्वक अर्पित करता है, मन से अर्पण करनेवाले उस भक्त का वह सब मैं खाता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ। इसलिये-