भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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२१२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता सत्ययुग का प्रभाव है। उस समय सब योगी विज्ञानी होते हैं, ईश्वर से मिलनेवाले होते हैं, स्वाभाविक ध्यान पकड़ने की उनमें क्षमता रहती है। विवेकीजन युगधर्मों का उतार-चढ़ाव मन में समझते हैं। मन के निरोध के लिये अधर्म का परित्याग कर धर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं। निरुद्ध मन का भी विलय हो जाने पर युगों के साथ-साथ कल्प का भी अन्त हो जाता है। पूर्णता में प्रवेश दिलाकर कल्प भी शान्त हो जाता है। यही प्रलय है, जब प्रकृति पुरुष में विलीन हो जाती है। इसके पश्चात् महापुरुष की जो रहनी है वही उसकी प्रकृति है, उसका स्वभाव है। योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! मूढ़लोग मुझे नहीं जानते। मुझ ईश्वरों के ईश्वर को भी तुच्छ समझते हैं, साधारण मनुष्य मानते हैं। प्रत्येक महापुरुष के साथ यह विडम्बना रही है कि तत्कालीन समाज ने उनकी उपेक्षा की, उनका डटकर विरोध हुआ। श्रीकृष्ण भी इसके अपवाद नहीं थे। वे कहते हैं- मैं परमभाव में स्थित हूँ; किन्तु शरीर मेरा भी मनुष्य का ही है, अतः मूढ़ पुरुष मुझे तुच्छ कहकर, मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। ऐसे लोग व्यर्थ आशावाले हैं, व्यर्थ कर्मवाले हैं, व्यर्थ ज्ञानवाले हैं कि कुछ भी करें और कह दें कि हम तो कामना नहीं करते, हो गये निष्काम कर्मयोगी। वे आसुरी स्वभाववाले मुझे नहीं परख पाते; किन्तु दैवी सम्पद् को प्राप्त जन अनन्य भाव से मेरा ध्यान करते हैं, मेरे गुणों का निरन्तर चिन्तन करते हैं। अनन्य उपासना अर्थात् यज्ञार्थ कर्म के दो ही मार्ग हैं। पहला है ज्ञानमार्ग अर्थात् अपने भरोसे, अपनी शक्ति को समझकर उसी नियत कर्म में प्रवृत्त होना और दूसरी विधि स्वामी-सेवक भावना की है, जिसमें सद्गुरु के प्रति समर्पित होकर वही कर्म किया जाता है। इन्हीं दो दृष्टियों से लोग मुझे उपासते हैं; किन्तु उनके द्वारा जो पार लगता है वह यज्ञ, वह हवन, वह कर्त्ता, श्रद्धा और औषधि- जिससे भवरोग की चिकित्सा होती है, मैं ही हूँ। अन्त में जो गति प्राप्त होती है, वह गति भी मैं ही हूँ। इसी यज्ञ को लोग ‘त्रैविद्या:’- प्रार्थना, यजन और समत्व दिलानेवाली विधियों से सम्पादित करते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की कामना करते हैं तो मैं

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