भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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दशम अध्याय २२९ में पार पाता है। जीतनेवालों की विजय मैं हूँ और व्यवसायियों का निश्चय (जिसे अध्याय दो, श्लोक इकतालीस में कह आये हैं- इस योग में निश्चयात्मक क्रिया एक है, बुद्धि एक ही है, दिशा एक ही है ऐसी), क्रियात्मिका बुद्धि मैं हूँ। सात्त्विक पुरुषों का तेज और ओज मैं हूँ। वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः। मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७॥ वृष्णिवंश में मैं वासुदेव अर्थात् सर्वत्र वास करनेवाला देव हूँ। पाण्डवों में मैं धनंजय हूँ। पुण्य ही पाण्डु है और आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। पुण्य से प्रेरित होकर आत्मिक सम्पत्ति को अर्जित करनेवाला धनंजय मैं हूँ। मुनियों में मैं व्यास हूँ। परमतत्त्व को व्यक्त करने की जिसमें क्षमता है, वह मुनि मैं हूँ। कवियों में उशना अर्थात् उसमें प्रवेश दिलानेवाला काव्यकार मैं हूँ। दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्। मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८॥ दमन करनेवालों में दमन की शक्ति मैं हूँ। जीतने की इच्छावालों की मैं नीति हूँ। गुप्त रखने योग्य भावों में मैं मौन हूँ और ज्ञानवानों में साक्षात् के साथ मिलनेवाली जानकारी, पूर्ण ज्ञान मैं हूँ। यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन। न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥३९॥ अर्जुन! सब भूतों की उत्पत्ति का कारण भी मैं ही हूँ; क्योंकि चर और अचर ऐसा कोई भी भूत नहीं है जो मुझसे रहित हो। मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ। सब मेरे ही सकाश से हैं। नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप। एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४०॥ परंतप अर्जुन! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है। अपनी विभूतियों का विस्तार तो मैंने संक्षेप में कहा है, वस्तुतः वे अनन्त हैं।