यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ ॥ अथैकादशोऽध्यायः ॥ गत अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपनी प्रधान-प्रधान विभूतियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया; किन्तु अर्जुन को लगा कि उसने विस्तार से सुन लिया है। उसने कहा कि आपकी वाणी सुनने से मेरा सारा मोह नष्ट हो गया; किन्तु आपने जो कहा, उसे प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। सुनने और देखने में पश्चिम और पूर्व का अन्तर है। चलकर देखने पर वस्तुस्थिति कुछ और ही होती है। अर्जुन ने उस रूप को देखा तो काँपने लगा, क्षमायाचना करने लगा। क्या ज्ञानी भयभीत होता है? क्या उसे कोई जिज्ञासा रह जाती है? नहीं, बौद्धिक स्तर की जानकारी सदैव धूमिल रहती है। हाँ, वह यथार्थ जानकारी के लिये प्रेरणा अवश्य देती है। इसलिये अर्जुन ने निवेदन किया- अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्। यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥१॥ भगवन्! मुझ पर अनुग्रह करने के लिये जो आपके द्वारा गोपनीय अध्यात्म में प्रवेश दिलानेवाला उपदेश कहा गया, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया। मैं ज्ञानी हो गया। भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया। त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२॥ क्योंकि हे कमलनेत्र! मैंने भूतों की उत्पत्ति और प्रलय को आपसे विस्तारपूर्वक सुना है तथा आपका अविनाशी प्रभाव भी सुना है।