यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्। सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्॥११॥ दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए, दिव्य गन्ध का अनुलेपन किये हुए, सब प्रकार आश्चर्यों से युक्त सीमारहित विराट्स्वरूप परमदेव को दृष्टि मिलने पर अर्जुन ने देखा। दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥१२॥ (अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र, संयमरूपी संजय- जैसा पीछे आया है।) संजय बोला- हे राजन्! आकाश में एक साथ हजार सूर्यों के उदय होने से जितना प्रकाश होता है, वह भी विश्वरूप उन महात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित् ही हो। यहाँ श्रीकृष्ण महात्मा ही हैं, योगेश्वर थे। तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा। अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३॥ पाण्डुपुत्र अर्जुन ने (पुण्य ही पाण्डु है। पुण्य ही अनुराग को जन्म देता है) उस समय अनेक प्रकार से विभक्त हुए सम्पूर्ण जगत् को उन परमदेव के शरीर में एक जगह स्थित देखा। ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः। प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४॥ इसके पश्चात् आश्चर्य से युक्त, हर्षित रोमोंवाला वह अर्जुन परमात्मदेव को शिर से प्रणाम करके (पहले भी प्रणाम करता था; किन्तु प्रभाव देखने पर सादर प्रणाम कर) हाथ जोड़कर बोला। यहाँ अर्जुन ने अन्तःकरण से नमन किया और कहा- अर्जुन उवाच पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्। ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्॥१५॥