यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
पृष्ठ 273, कुल 429 में से
संदर्भ में पढ़ें२३८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता भगवन्! आप जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् अक्षय परमात्मा हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप शाश्वत-धर्म के रक्षक हैं तथा आप अविनाशी सनातन पुरुष हैं- ऐसा मेरा मत है। आत्मा का स्वरूप क्या है? शाश्वत है, सनातन है, अव्यक्त रूप है, अविनाशी है। यहाँ श्रीकृष्ण का क्या स्वरूप है? वही शाश्वत, सनातन, अव्यय, अविनाशी अर्थात् प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष भी उसी आत्मभाव में स्थित होता है। तभी तो भगवान और आत्मा एक ही लक्षणवाले हैं। अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य- मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्। पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥१९॥ हे परमात्मन्! मैं आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त हाथोंवाला (पहले हजारों थे, अब अनन्त हो गये), चन्द्रमा और सूर्यरूपी नेत्रोंवाला (तब तो भगवान काने हो गये। एक आँख चन्द्रमा की तरह क्षीण प्रकाशवाली और दूसरी सूर्य की तरह सतेज। ऐसा कुछ नहीं है। सूर्य के समान प्रकाश प्रदान करनेवाला और चन्द्रमा की तरह शीतलता प्रदान करनेवाला गुण भगवान में है। शशि-सूर्य मात्र प्रतीक हैं। अर्थात् चन्द्रमा और सूर्य की दृष्टिवाले) तथा प्रज्वलित अग्निरूपी मुखवाला तथा अपने तेज से इस जगत् को तपाते हुए देखता हूँ। द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः। दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥२०॥ हे महात्मन्! अन्तरिक्ष और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एकमात्र आपसे ही परिपूर्ण हैं। आपके इस अलौकिक, भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अत्यन्त व्यथित हो रहे हैं।