भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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पृष्ठ 284

एकादश अध्याय २४९ हैं। कोई ‘ओम्’ जपने के अधिकार और अनधिकार की चर्चा से भयभीत है, तो कोई महात्माओं की दुहाई देता है अथवा कोई श्रीकृष्ण ही नहीं, उनसे पहले राधा और गोपियों का नाम भी उनकी शीघ्र प्रसन्नता के लोभ में जपता है। पुरुष श्रद्धामय है इसलिये उसका ऐसा जपना मात्र भावुकता है। यदि आप सचमुच भाविक हैं तो उनके आदेश का पालन करें। वे अव्यक्त में स्थित होते हुए भी आज आपके सामने नहीं हैं लेकिन उनकी वाणी आपके समक्ष है। उनकी आज्ञा का पालन करें अन्यथा आप ही बताइये कि गीता में आपका क्या स्थान हैं? हाँ, इतना अवश्य है कि ‘अध्येष्यते च य इमं..... श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।’- जो अध्ययन करता है, सुनता है वह ज्ञान तथा यज्ञ को जान लेता है, शुभ लोकों को पा जाता है। अतः अध्ययन अवश्य करें। प्राण-अपान के चिन्तन में ‘कृष्ण’ नाम का क्रम पकड़ में नहीं आता। बहुत से लोग कोरी भावुकतावश केवल ‘राधे-राधे’ कहने लगे हैं। आजकल अधिकारियों से काम न होने पर उनके सगे-सम्बन्धियों से, प्रेमी या पत्नी से ‘सोर्स’ लगाकर काम चला लेने की परम्परा है। लोग सोचते हैं कि कदाचित् भगवान के घर में भी ऐसा चलता होगा, अतः उन्होंने ‘कृष्ण’ कहना बन्द करके ‘राधे-राधे’ कहना आरम्भ कर दिया। वे कहते हैं- ‘राधे-राधे ! श्याम मिला दे।’ राधा एक बार बिछुड़ी तो स्वयं श्याम से नहीं मिल पायी, वह आपको कैसे मिला दे? अतः अन्य किसी का कहना न मानकर श्रीकृष्ण के आदेश को आप अक्षरशः मानें, ओम् का जप करें। हाँ, यहाँ तक उचित है कि राधा हमारा आदर्श हैं, उतनी ही लगन से हमें भी लगना चाहिये। यदि पाना है तो राधा की तरह विरही बनना है। आगे भी अर्जुन ने ‘कृष्ण’ कहा। ‘कृष्ण’ उनका प्रचलित नाम था। ऐसे कई नाम थे, जैसे- ‘गोपाल’। बहुत से साधक गुरु-गुरु या गुरु का प्रचलित नाम भावुकतावश जपना चाहते हैं; किन्तु प्राप्ति के पश्चात् प्रत्येक महापुरुष का वही नाम है, जिस अव्यक्त में वह स्थित है। बहुत से शिष्य प्रश्न करते हैं- “गुरुदेव ! जब ध्यान आपका करते हैं तो पुराना नाम ‘ओम्’