यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश अध्याय २७७ जन्मता अर्थात् उसका पुनर्जन्म नहीं होता। यही मुक्ति है। अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ब्रह्म और प्रकृति की प्रत्यक्ष जानकारी के साथ मिलनेवाली परमगति अर्थात् उसका पुनर्जन्म से निवृत्ति पर प्रकाश डाला और अब वे उस योग पर बल देते हैं जिसकी प्रक्रिया है आराधना; क्योंकि इस कर्म को कार्यरूप दिये बिना कोई पाता नहीं। ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना। अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।।२४।। हे अर्जुन ! उस ‘आत्मानम्’– परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो ‘आत्मना’– अपने अन्तर्चिन्तन से ध्यान के द्वारा ‘आत्मनि’– हृदय-देश में देखते हैं, कितने ही सांख्ययोग के द्वारा (अर्थात् अपनी शक्ति को समझते हुए उसी कर्म में प्रवृत्त होते हैं।) और अन्य बहुत से उसे निष्काम कर्मयोग के द्वारा देखते हैं। समर्पण के साथ उसी नियत कर्म में प्रवृत्त होते हैं। प्रस्तुत श्लोक में मुख्य साधन है ध्यान। उस ध्यान में प्रवृत्त होने के लिये सांख्ययोग और निष्काम कर्मयोग दो धाराएँ हैं। अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।२५।। परन्तु दूसरे, जिनको साधना का ज्ञान नहीं है, वे इस प्रकार न जानते हुए ‘अन्येभ्यः’– दूसरे जो तत्त्व को जाननेवाले महापुरुष हैं, उनके द्वारा सुनकर ही उपासना करते हैं और वे सुनने के परायण हुए पुरुष भी मृत्युरूपी संसार- सागर से निःसन्देह तर जाते हैं। अतः कुछ भी पार न लगे तो सत्संग करें। सन्तों के सान्निध्य में रहें। यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ।।२६।। हे अर्जुन! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर-जंगम वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, उन सम्पूर्ण को तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान। प्राप्ति कब होती है? इस पर कहते हैं-