यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता सुरति (स्मृति) ऐसा पटल है, जिस पर संस्कारों का अंकन सदैव होता रहता है। यदि पथिक को इष्ट में प्रवेश दिलानेवाली जानकारी धूमिल पड़ती है तो उस स्मृति-पटल पर प्रकृति अंकित होने लगती है, जो विनाश का कारण है। इसलिये पूर्तिपर्यन्त साधक को इष्ट-सम्बन्धी जानकारी दुहराते रहना चाहिये। आज स्मृति जीवन्त है; किन्तु अग्रेतर अवस्थाओं में प्रवेश मिलने के साथ यह अवस्था नहीं रह जायेगी। इसीलिये 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि ब्रह्मविद्या का चिन्तन रोज करो, एक माला रोज घुमाओ- जो चिन्तन से घुमायी जाती है, बाहर की माला नहीं। यह तो साधक के लिये है; किन्तु जो वास्तविक सद्गुरु होते हैं वे सतत उस पथिक के पीछे लगे रहते हैं। भीतर उसकी आत्मा से जागृत होकर तथा बाहर अपने क्रिया-कलापों से उसे भविष्य में घटित होनेवाली परिस्थितियों से अवगत कराते चलते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण भी महापुरुष थे। अर्जुन शिष्य के स्थान पर है। उसने उनसे सँभालने की प्रार्थना की थी। इसलिये योगेश्वर श्रीकृष्ण का कथन है कि ज्ञानों में भी अति उत्तम ज्ञान को मैं पुनः तेरे लिये कहूँगा। श्रीभगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्। यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।१।। अर्जुन ! ज्ञानों में भी अति उत्तम ज्ञान, परमज्ञान को मैं फिर भी तेरे लिये कहूँगा (जिसे पीछे कह चुके हैं), जिसे जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परमसिद्धि को प्राप्त होते हैं (जिसके बाद कुछ भी पाना शेष नहीं रहता)। इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः। सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।।२।। इस ज्ञान का 'उपाश्रित्य' - नजदीक से आश्रय लेकर, क्रिया से चलकर, पास पहुँचकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए लोग सृष्टि के आदि में पुनः जन्म नहीं