भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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चतुर्दश अध्याय २८७ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत। रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।१०।। हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है, वैसे ही सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है तथा इसी प्रकार रजोगुण और सत्त्वगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है। यह कैसे पहचाना जाय कि कब और कौन-सा गुण कार्य कर रहा है?- सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते। ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।११।। जिस काल में इस शरीर तथा अन्तःकरण और सम्पूर्ण इन्द्रियों में ईश्वरीय प्रकाश और बोधशक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण विशेष वृद्धि को प्राप्त हुआ है। तथा- लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ।।१२।। हे अर्जुन! रजोगुण की विशेष वृद्धि होने पर लोभ, कार्य में प्रवृत्त होने की चेष्टा, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति अर्थात् मन की चंचलता, विषय-भोगों की लालसा- यह सब उत्पन्न होते हैं। अब तमोगुण की वृद्धि में क्या होता है?- अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।।१३।। अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर ‘अप्रकाशः’- (प्रकाश परमात्मा का द्योतक है) ईश्वरीय प्रकाश की ओर न बढ़ने का स्वभाव, ‘कार्यम् कर्म’- जो करने योग्य प्रक्रिया-विशेष है उसमें अप्रवृत्ति, अन्तःकरण में व्यर्थ की चेष्टाओं का प्रवाह और संसार में मुग्ध करनेवाली प्रवृत्तियाँ- यह सभी उत्पन्न होते हैं। इन गुणों की जानकारी से लाभ क्या है?- यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते।।१४।।

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