यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता परमधाम है अर्थात् उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इस पद की प्राप्ति में सबका समान अधिकार है। इस पर कहते हैं- ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।७।। 'जीवलोके' अर्थात् इस देह में (शरीर ही लोक है) यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और वही इस त्रिगुणमयी माया में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है। भला कैसे?- शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः। गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।८।। जिस प्रकार वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को ग्रहण करके ले जाता है, ठीक उसी प्रकार देह का स्वामी जीवात्मा जिस पहले शरीर को त्यागता है, उससे मन और पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के कार्यकलापों को ग्रहण करके (आकर्षित करके, साथ लेकर) फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है, उसमें जाता है। (जब अगला शरीर तत्काल निश्चित है तो आटे का पिण्ड बनाकर किसे पहुँचाते हैं? लेता कौन है? इसलिये श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि यह अज्ञान तुझे कहाँ से उत्पन्न हो गया कि पिण्डोदक क्रिया लुप्त हो जायेगी।) वहाँ जाकर करता क्या है? मनसहित छः इन्द्रियाँ कौन हैं?- श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च। अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते।।९।। उस शरीर में स्थित होकर यह जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, जिह्वा, नासिका और मन का आश्रय लेकर अर्थात् इन सबके सहारे ही विषयों का सेवन करता है। किन्तु ऐसा दिखायी नहीं पड़ता, सब उसे देख नहीं पाते। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्। विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः।।१०।। शरीर छोड़कर जाते हुए, शरीर में स्थित हुए, विषयों को भोगते हुए अथवा तीनों गुणों से युक्त हुए भी जीवात्मा को विशेष मूढ़ अज्ञानी नहीं जानते।