यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जानता है वह वेदवित् है; किन्तु उसको काटनेवाला ही जानता है। यहाँ कहते हैं-मैं भी वेदवित् हूँ। उन वेदविदों में अपनी भी गणना करते हैं। अतः श्रीकृष्ण भी यहाँ वेदवित् पुरुषोत्तम हैं, जिसे पाने का अधिकार मानवमात्र को है। अन्त में उन्होंने बताया कि लोक में दो प्रकार के पुरुष हैं। भूतादिकों के सम्पूर्ण शरीर क्षर हैं। मन की कूटस्थ अवस्था में यही पुरुष अक्षर है; किन्तु है द्वन्द्वात्मक और इससे भी परे जो परमात्मा, परमेश्वर, अव्यक्त और अविनाशी कहा जाता है, वह वस्तुतः अन्य ही है। यह क्षर और अक्षर से परेवाली अवस्था है, यही परमस्थिति है। इससे संगत करते हुए कहते हैं कि मैं भी क्षर- अक्षर से परे वही हूँ, इसलिये लोग मुझे पुरुषोत्तम कहते हैं। इस प्रकार उत्तम पुरुष को जो जानते हैं वे ज्ञानी भक्तजन सदैव, सब ओर से मुझे ही भजते हैं। उनकी जानकारी में अन्तर नहीं है। अर्जुन! यह अत्यन्त गोपनीय रहस्य मैंने तेरे प्रति कहा। प्राप्तिवाले महापुरुष सबके सामने नहीं कहते; किन्तु अधिकारी से दुराव भी नहीं रखते। अगर दुराव करेंगे तो वह पायेगा कैसे? इस अध्याय में आत्मा की तीन स्थितियों का चित्रण क्षर, अक्षर और अति उत्तम पुरुष के रूप में स्पष्ट किया गया, जैसा इससे पहले किसी अन्य अध्याय में नहीं है। अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ‘पुरुषोत्तमयोगो’ नाम पञ्चदशोऽध्यायः।।१५।। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में ‘पुरुषोत्तम योग’ नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः ‘यथार्थ गीता’ भाष्ये ‘पुरुषोत्तमयोगो’ नाम पञ्चदशोऽध्यायः।।१५।। इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में ‘पुरुषोत्तम योग’ नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।