भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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३१२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता अनेक प्रकार से भ्रमित हुए चित्तवाले, मोह-जाल में फँसे हुए, विषय- भोगों में अत्यन्त आसक्त वे आसुरी स्वभाववाले मनुष्य अपवित्र नरक में गिरते हैं। आगे श्रीकृष्ण स्वयं बतायेंगे कि नरक क्या है? आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः। यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥१७॥ अपने आपको ही श्रेष्ठ माननेवाले, धन और मान के मद से युक्त होकर वे घमण्डी मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से यजन करते हैं। क्या वही यज्ञ करते हैं, जैसा श्रीकृष्ण ने बताया है? नहीं, उस विधि को छोड़कर करते हैं; क्योंकि विधि योगेश्वर ने स्वयं बतायी है। (अध्याय ४/२४-३३ तथा अध्याय ६/१०-१७) अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥१८॥ वे दूसरों की निन्दा करनेवाले; अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोध के परायण हुए पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं। शास्त्रविधि से परमात्मा का सुमिरन एक यज्ञ है। जो इस विधि को त्यागकर नाममात्र का यज्ञ करते हैं, यज्ञ के नाम पर कुछ- न-कुछ करते ही रहते हैं, वे अपने और दूसरे के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं। लोग द्वेष करते ही रहते हैं और बच भी जाते हैं, क्या ये भी बच जायेंगे? इस पर कहते हैं- नहीं, तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥१९॥ मुझसे द्वेष करनेवाले उन पापाचारी, क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में निरन्तर आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ। जो शास्त्रविधि को त्यागकर यजन करते हैं वे पापयोनि हैं, वही मनुष्यों में अधम हैं, इन्हीं को क्रूरकर्मी कहा गया। अन्य कोई अधम नहीं है। पीछे कहा था, ऐसे अधमों को मैं नरक में गिराता हूँ, उसी को यहाँ कहते हैं कि उन्हें अजस्र आसुरी योनियों में गिराता हूँ। यही नरक है। साधारण जेल की यातना भयंकर होती है और यहाँ अनवरत आसुरी