यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश अध्याय ३१९ होने से पूर्व यह मलिन था? पतंजलि कहते हैं- ‘वृत्तिसारूप्यमितरत्र।’ (१/४)– दूसरे समय में जैसा वृत्ति का रूप है, वैसा ही वह द्रष्टा है। यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं– यह पुरुष श्रद्धामय है, श्रद्धा से ओतप्रोत, कहीं- न-कहीं श्रद्धा अवश्य होगी और जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है। जैसी वृत्ति, वैसा पुरुष। अब तीनों श्रद्धाओं का विभाजन करते हैं– यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४॥ उनमें से सात्त्विक पुरुष देवताओं को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं तथा अन्य तामस पुरुष प्रेत और भूतों को पूजते हैं। वे पूजन में अथक परिश्रम भी करते हैं। अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५॥ वे मनुष्य शास्त्रविधि से रहित घोर कल्पित (कल्पित क्रियाएँ रचकर) तप तपते हैं। दम्भ और अहंकार से युक्त, कामना और आसक्ति के बल से बँधे हुए– कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६॥ वे शरीररूप से स्थित भूतसमुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ अन्तर्यामी को भी कृश करनेवाले हैं अर्थात् दुर्बल करनेवाले हैं। आत्मा प्रकृति के दरारों में पड़कर विकारों से दुर्बल और यज्ञ-साधनों से सबल होती है। उन अज्ञानियों (अचेतों) को निश्चय ही तू असुर जान अर्थात् वे सब-के-सब असुर हैं। प्रश्न पूरा हुआ। शास्त्रविधि को त्यागकर भजनेवाले सात्त्विक पुरुष देवताओं को, राजस पुरुष यक्ष-राक्षसों को और तामस पुरुष भूत-प्रेतों को पूजते हैं। केवल पूजते ही नहीं, घोर तप तपते हैं; किन्तु अर्जुन! शरीररूप से भूतों को और अन्तर्यामी