भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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सप्तदश अध्याय ३२१ को दुम्बा, चीनियों को मेढक, तो दूसरी ओर ध्रुव-जैसे ठंडे प्रदेशों में मांस बिना गुजारा नहीं है। रूस और मंगोलिया के आदिवासी खाद्य में घोड़े इस्तेमाल करते हैं, यूरोपवासी गाय तथा सुअर दोनों खाते हैं; फिर भी विद्या, बुद्धि- विकास तथा उन्नति में अमेरिका और यूरोपवासी प्रथम श्रेणी में गिने जा रहे हैं। गीता के अनुसार रसयुक्त, चिकना और स्थिर रहनेवाला भोज्य पदार्थ सात्त्विक है। लम्बी आयु, अनुकूल, बल-बुद्धि बढ़ानेवाला, आरोग्यवर्द्धक पदार्थ सात्त्विक है। स्वभाव से हृदय को प्रिय लगनेवाला भोज्य पदार्थ सात्त्विक है। अतः कहीं किसी खाद्य पदार्थ को घटाना-बढ़ाना नहीं है। परिस्थिति, परिवेश तथा देशकाल के अनुसार जो भोज्य वस्तु स्वभाव से प्रिय लगे और जीवनी शक्ति प्रदान करे, वही सात्त्विकी है। वस्तु सात्त्विकी, राजसी या तामसी नहीं होती, उसका प्रयोग सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी होता है। इसी अनुकूलन के लिये जो व्यक्ति घर-परिवार त्यागकर केवल ईश्वर- आराधन में लिप्त हैं, संन्यास आश्रम में हैं, उनके लिये मांस-मदिरा त्याज्य है; क्योंकि अनुभव से देखा गया है कि ये पदार्थ आध्यात्मिक मार्ग के विपरीत मनोभाव उत्पन्न करते हैं, अतः इनसे साधन-पथ से भ्रष्ट होने की अधिक सम्भावना है। जो एकान्त-देश का सेवन करनेवाले विरक्त हैं, उनके लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अध्याय छः में आहार के लिये एक नियम दिया कि 'युक्ताहार विहारस्य' इसी को ध्यान में रखकर आचरण करना चाहिये। जो भजन में सहायक है उतना (वही) आहार ग्रहण करना चाहिये। कट्वम्ललवणात्युष्णातीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९॥ कड़वे, खट्टे, अधिक नमकीन, अत्यन्त गर्म, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करनेवाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं। यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१०॥