यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश अध्याय ३२३ सकने में असमर्थ है, मन के अन्तराल में निरुद्ध करने की क्षमता से रहित है, दक्षिणा अर्थात् सर्वस्व के समर्पण से रहित है तथा जो श्रद्धारहित है, ऐसा यज्ञ तामस यज्ञ कहा जाता है। ऐसा पुरुष वास्तविक यज्ञ को जानता ही नहीं। अब प्रस्तुत है तप- देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।१४।। परमदेव परमात्मा, द्वैत पर जय प्राप्त करनेवाले द्विज, सद्गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य तथा अहिंसा शरीर-सम्बन्धी तप कहा जाता है। शरीर सदैव वासनाओं की ओर बहकता है, इसे अन्तःकरण की उपर्युक्त वृत्तियों के अनुरूप तपाना शारीरिक तप है। अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।१५।। उद्वेग न पैदा करनेवाला, प्रिय, हितकारक और सत्य भाषण तथा परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाले शास्त्रों के चिन्तन का अभ्यास, नाम-जप- यह वाणी- सम्बन्धी तप कहा जाता है। वाणी विषयोन्मुख विचारों को भी व्यक्त करती रहती है, इसे उस ओर से समेटकर परमसत्य परमात्मा की दिशा में लगाना वाणी-सम्बन्धी तप है। अब मन-सम्बन्धी तप देखें- मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।१६।। मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन अर्थात् इष्ट के अतिरिक्त अन्य विषयों का स्मरण भी न हो, मन का निरोध, अन्तःकरण की सर्वथा पवित्रता- यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है। उपर्युक्त तीनों शरीर, वाणी और मन का तप मिलाकर एक सात्त्विक तप है। श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते।।१७।।