यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश अध्याय ३२५ उद्देश्य बनाकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है। अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।। जो दान बिना सत्कार किये अथवा तिरस्कारपूर्वक झिड़ककर अयोग्य देश-काल में अनधिकारियों को दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है। 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे- "हो, कुपात्र को दान देने से दाता नष्ट हो जाता है।" ठीक इसी प्रकार श्रीकृष्ण का कहना है कि दान देना ही कर्त्तव्य है। देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर बदले में उपकार न चाहने की भावना से उदारता के साथ दिया जानेवाला दान सात्त्विक है। कठिनाई से निकलनेवाला, बदले में फल की भावना से दिया जानेवाला दान राजस है और बिना सत्कार के, झिड़कियों के साथ प्रतिकूल देश-काल में कुपात्र को दिया जानेवाला दान तामस है, लेकिन है दान ही; किन्तु जो देह, गेह इत्यादि सबके ममत्व को त्यागकर एकमात्र इष्ट पर ही निर्भर है, उसके लिये दान का विधान इससे और उन्नत है- वह है सर्वस्व का समर्पण, सम्पूर्ण वासनाओं से हटकर मन का समर्पण; जैसा कि श्रीकृष्ण ने कहा है- 'मय्येव मन आधत्स्व।' अतः दान नितान्त आवश्यक है। अब प्रस्तुत है ॐ, तत् और सत् का स्वरूप- ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।२३।। अर्जुन! ॐ, तत् और सत्- ऐसा तीन प्रकार का नाम 'ब्रह्मणः निर्देशः स्मृतः'- ब्रह्म का निर्देश करता है, स्मृति दिलाता है, संकेत करता है और ब्रह्म का परिचायक है। उसी से 'पुरा'- पूर्व में (आरम्भ में) ब्राह्मण, वेद और यज्ञादि रचे गये हैं। अर्थात् ब्राह्मण, यज्ञ और वेद ओम् से पैदा होते हैं। ये योगजन्य हैं। ओम् के सतत चिन्तन से ही इनकी उत्पत्ति है, और कोई तरीका नहीं है। तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्।।२४।।