यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता राजसी और तामसी तीन प्रकार की होती है। सात्त्विकी श्रद्धावाले देवताओं को, राजसी श्रद्धावाले यक्ष (जो यश, शौर्य प्रदान करे), राक्षसों (जो सुरक्षा दे सके) का पीछा करते हैं और तामसी श्रद्धावाले भूत-प्रेतों को पूजते हैं। शास्त्रविधि से रहित इन पूजाओं द्वारा ये तीनों प्रकार के श्रद्धालु शरीर में स्थित भूतसमुदाय अर्थात् अपने संकल्पों और हृदय-देश में स्थित मुझ अन्तर्यामी को भी कृश करते हैं, न कि पूजते हैं। उन सबको निश्चय ही तू असुर जान अर्थात् भूत, प्रेत, यक्ष, राक्षस तथा देवताओं को पूजनेवाले असुर हैं। देवता-प्रसंग को श्रीकृष्ण ने यहाँ तीसरी बार उठाया है। पहले अध्याय सात में उन्होंने कहा कि- अर्जुन ! कामनाओं ने जिनका ज्ञान हर लिया है, वही मूढ़बुद्धि अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। दूसरी बार अध्याय नौ में उसी प्रश्न को दुहराते हुए कहा- जो अन्यान्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं; किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् शास्त्र में निर्धारित विधि से भिन्न है, अतः वह नष्ट हो जाता है। यहाँ अध्याय सत्रह में उन्हें आसुरी स्वभाववाला कहकर सम्बोधित किया। श्रीकृष्ण के शब्दों में एक परमात्मा की ही पूजा का विधान है। तदनन्तर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने चार प्रश्न लिये- आहार, यज्ञ, तप और दान। आहार तीन प्रकार के होते हैं। सात्त्विक पुरुष को तो आरोग्य प्रदान करनेवाले, स्वाभाविक प्रिय लगनेवाले, स्निग्ध आहार प्रिय होते हैं। राजस पुरुष को कड़वे, तीक्ष्ण, उष्ण, चटपटे, मसालेदार, रोगवर्द्धक आहार प्रिय होते हैं। तामस पुरुष को जूठा, बासी और अपवित्र आहार प्रिय होता है। शास्त्रविधि से निर्दिष्ट यज्ञ (जो आराधना की अन्तःक्रियाएँ हैं) जो मन का निरोध करता है, फलाकांक्षा से रहित वह यज्ञ सात्त्विक है। दम्भ-प्रदर्शन तथा फल के लिये किया जानेवाला वही यज्ञ राजस है और शास्त्रविधि से रहित, मन्त्र, दान तथा बगैर श्रद्धा से किया हुआ यज्ञ तामस है। परमदेव परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली सारी योग्यताएँ जिनमें हैं, उन प्राज्ञ सद्गुरु की अर्चना, सेवा और अन्तःकरण से अहिंसा, ब्रह्मचर्य और