यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता शरीर की आवश्यक खुराक मात्र है। तीनों गुण मनुष्य को देवता से कीटपर्यन्त शरीरों में ही बाँधते हैं। जब तक प्रकृति और प्रकृति से उत्पन्न गुण जीवित हैं, तब तक ‘कुरु’ लगा रहेगा। अतः जन्म-मृत्युवाला क्षेत्र, विकारोंवाला क्षेत्र कुरुक्षेत्र है और परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली पुण्यमयी प्रवृत्तियों (पाण्डवों) का क्षेत्र धर्मक्षेत्र है। पुरातत्त्वविद् पंजाब में, काशी-प्रयाग के मध्य तथा अनेकानेक स्थलों पर कुरुक्षेत्र की शोध में लगे हैं; किन्तु गीताकार ने स्वयं बताया है कि जिस क्षेत्र में यह युद्ध हुआ, वह कहाँ है। ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।’ (अ० १३/१) “अर्जुन! यह शरीर ही क्षेत्र है और जो इसको जानता है, इसका पार पा लेता है, वह क्षेत्रज्ञ है।” आगे उन्होंने क्षेत्र का विस्तार बताया, जिसमें दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार, पाँचों विकार और तीनों गुणों का वर्णन है। शरीर ही क्षेत्र है, एक अखाड़ा है। इसमें लड़नेवाली प्रवृत्तियाँ दो हैं- ‘दैवी सम्पद’ और ‘आसुरी सम्पद’, ‘पाण्डु की सन्तान’ और ‘धृतराष्ट्र की सन्तान’, ‘सजातीय और विजातीय प्रवृत्तियाँ’। अनुभवी महापुरुष की शरण जाने पर इन दोनों प्रवृत्तियों में संघर्ष का सूत्रपात होता है। यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का संघर्ष है और यही वास्तविक युद्ध है। विश्वयुद्धों से इतिहास भरा पड़ा है; किन्तु उनमें जीतनेवालों को भी शाश्वत विजय नहीं मिलती। ये तो आपसी बदले हैं। प्रकृति का सर्वथा शमन करके प्रकृति से परे की सत्ता का दिग्दर्शन करना और उसमें प्रवेश पाना ही वास्तविक विजय है। यही एक ऐसी विजय है, जिसके पीछे हार नहीं है। यही मुक्ति है, जिसके पीछे जन्म-मृत्यु का बन्धन नहीं है। इस प्रकार अज्ञान से आच्छादित प्रत्येक मन संयम के द्वारा जानता है कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के युद्ध में क्या हुआ? अब जैसा जिसके संयम का उत्थान है, वैसे-वैसे उसे दृष्टि आती जायेगी। सञ्जय उवाच दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्।।२।।