यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता मापकर कर्म करने की क्षमता को चार भागों में बाँटा। श्रीकृष्ण के शब्दों में कर्म एकमात्र अव्यक्त पुरुष की प्राप्ति की क्रिया है। ईश्वर-प्राप्ति का आचरण आराधना है, जिसकी शुरुआत मात्र एक इष्ट में श्रद्धा से है। चिन्तन की विधि- विशेष है, जिसे पीछे बता आये हैं। इस यज्ञार्थ कर्म को चार भागों में बाँटा। अब कैसे समझें कि हममें कौन से गुण हैं और किस श्रेणी के हैं? इस पर यहाँ कहते हैं- शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥४२॥ मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, पूर्ण पवित्रता; मन, वाणी और शरीर को इष्ट के अनुरूप तपाना, क्षमाभाव; मन, इन्द्रियों और शरीर की सर्वथा सरलता, आस्तिक बुद्धि अर्थात् एक इष्ट में सच्ची आस्था, ज्ञान अर्थात् परमात्मा की जानकारी का संचार, विज्ञान अर्थात् परमात्मा से मिलनेवाले निर्देशों की जागृति एवं उसके अनुसार चलने की क्षमता- यह सब स्वभाव से उत्पन्न हुए ब्राह्मण के कर्म हैं अर्थात् जब स्वभाव में यह योग्यताएँ पायी जायें, कर्म धारावाही होकर स्वभाव में ढल जाय तो वह ब्राह्मण श्रेणी का कर्त्ता है। तथा- शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥४३॥ शूरवीरता, ईश्वरीय तेज का मिलना, धैर्य, चिन्तन में दक्षता अर्थात् ‘कर्मसु कौशलम्’- कर्म करने में दक्षता, प्रकृति के संघर्ष से न भागने का स्वभाव, दान अर्थात् सर्वस्व का समर्पण, सब भावों पर स्वामिभाव अर्थात् ईश्वरभाव- यह सब क्षत्रिय के ‘स्वभावजम्’- स्वभाव से उत्पन्न हुए कर्म हैं। स्वभाव में ये योग्यताएँ पायी जाती हैं तो वह कर्त्ता क्षत्रिय है। अब प्रस्तुत है, वैश्य तथा शूद्र का स्वरूप- कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४॥ कृषि, गो-रक्षा और व्यवसाय वैश्य के स्वभावजन्य कर्म हैं। गोपालन की क्यों? भैंस को मार डालें? बकरी न रखें? ऐसा कुछ नहीं है। सुदूर वैदिक