यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश अध्याय ३४९ उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझे तत्त्व से भली प्रकार जानता है। वह तत्त्व है क्या? मैं जो और जिस प्रभाववाला हूँ; अजर, अमर, शाश्वत जिन अलौकिक गुणधर्मोंवाला हूँ, उसे जानता है और मुझे तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रवेश कर जाता है। प्राप्तिकाल में तो भगवान दिखायी पड़ते हैं और प्राप्ति के ठीक बाद, तत्क्षण वह अपने ही आत्मस्वरूप को उन ईश्वरीय गुणधर्मों से युक्त पाता है कि आत्मा ही अजर, अमर, शाश्वत, अव्यक्त और सनातन है। दूसरे अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- आत्मा ही सत्य है, सनातन है, अव्यक्त और अमृतस्वरूप है; किन्तु इन विभूतियों से युक्त आत्मा को केवल तत्त्वदर्शियों ने देखा। अब वहाँ प्रश्न स्वाभाविक है कि वस्तुतः तत्त्वदर्शिता है क्या? बहुत से लोग पाँच तत्त्व, पचीस तत्त्व की बौद्धिक गणना करने लगते हैं; किन्तु इस पर श्रीकृष्ण ने यहाँ अठारहवें अध्याय में निर्णय दिया कि परमतत्त्व है परमात्मा, जो उसे जानता है वही तत्त्वदर्शी है। अब यदि आपको तत्त्व की चाह है, परमात्मतत्त्व की चाह है तो भजन-चिन्तन आवश्यक है। यहाँ श्लोक उनचास से बचपन तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि संन्यास मार्ग में भी कर्म करना है। उन्होंने कहा, ‘संन्यासेन’- संन्यास के द्वारा (अर्थात् ज्ञानयोग के द्वारा) कर्म करते-करते इच्छारहित, आसक्तिरहित तथा जीते हुए शुद्ध अन्तःकरणवाला पुरुष जिस प्रकार नैष्कर्म्य की परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उसे संक्षेप में कहूँगा। अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध, मद, मोह इत्यादि प्रकृति में गिरानेवाले विकार जब सर्वथा शान्त हो जाते हैं और विवेक, वैराग्य, शम, दम, एकान्त-सेवन, ध्यान इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली योग्यताएँ जब पूर्णतया परिपक्व हो जाती हैं, उस समय वह ब्रह्म को जानने योग्य होता है। उस योग्यता का नाम ही पराभक्ति है। इसी योग्यता द्वारा वह तत्त्व को जानता है। तत्त्व है क्या? मुझे जानता है (भगवान जो है, जिन विभूतियों से युक्त है उसे जानता है) और मुझे जानकर तत्क्षण मुझमें ही स्थित हो जाता है। अर्थात् ब्रह्म, तत्त्व, ईश्वर, परमात्मा और आत्मा एक दूसरे के पर्याय हैं। एक की जानकारी के साथ ही इन सबकी जानकारी हो जाती है। यही परमसिद्धि, परमगति, परमधाम भी है।