भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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अष्टादश अध्याय ३५७ के बिना कोई भी साधक श्रेय-पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता। अतः सद्गुरु के आदेश का पालन करने के लिये, श्रेय-पथ पर अग्रसर होने के लिये सम्पूर्ण गीता का श्रवण अति आवश्यक है। अर्जुन का समाधान हो गया। साथ ही योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निःसृत वाणी का उपसंहार हुआ। इस पर संजय बोला- (ग्यारहवें अध्याय में विराट् रूप का दर्शन करा लेने पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा मैं इस प्रकार देखने को (जैसा तूने देखा है), तत्त्व से जानने तथा प्रवेश करने को सुलभ हूँ (११/५४)। इस प्रकार दर्शन करनेवाले साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं और यहाँ अभी अर्जुन से पूछते हैं- क्या तुम्हारा मोह नष्ट हुआ? अर्जुन ने कहा- मेरा मोह नष्ट हो गया। मैं अपनी स्मृति को प्राप्त हो गया हूँ। आप जो कहते हैं, वही करूँगा। दर्शन के साथ तो अर्जुन को मुक्त हो जाना चाहिये था। वस्तुतः अर्जुन को तो जो होना था, हो गया; किन्तु शास्त्र भविष्य में आनेवाली पीढ़ी के लिये होता है। उसका उपयोग आप सबके लिये ही है।) सञ्जय उवाच इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४॥ इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा अर्जुन (अर्जुन एक महात्मा है, योगी है, साधक है, न कि कोई धनुर्धर जो मारने के लिये खड़ा हो। अतः महात्मा अर्जुन) के इस विलक्षण और रोमांचकारी सम्वाद को सुना। आप में सुनने की क्षमता कैसे आयी? इस पर कहते हैं- व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥७५॥ श्री व्यासजी की कृपा से, उनकी दी हुई दृष्टि से मैंने इस परम गोपनीय योग को साक्षात् कहते हुए स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण से सुना है। संजय श्रीकृष्ण को योगेश्वर मानता है। जो स्वयं योगी हो और दूसरों को भी योग प्रदान करने की क्षमता रखता हो, वह योगेश्वर है।