यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता को सभ्य बनाने के लिये मुहम्मद ने विवाह, तलाक, वसीयत, लेन-देन, सूद, गवाही, कसम, प्रायश्चित, रोजी-रोटी, खान-पान, रहन-सहन इत्यादि विषय में एक सामाजिक व्यवस्था दी तथा मूर्ति-पूजा, शिर्क, व्यभिचार, चोरी, शराब, जुआ, माँ-दादी इत्यादि से विवाह पर प्रतिबन्ध लगाया। समलैंगिक तथा रजस्वला मैथुनों का निषेध करके रोजे के दिनों में भी इसके लिये ढील दी। जन्नत में बहुत-सी समवयस्क, अनछुई हूरों और किशोर बालकों का प्रलोभन दिया। यह कोई धर्म नहीं था, एक प्रकार की सामाजिक व्यवस्था थी। ऐसा कुछ कहकर उन्होंने वासना में डूबे हुए समाज को उधर से घुमाकर अपनी ओर उन्मुख किया। स्त्रियों को जन्नत में कितने पुरुष मिलेंगे?- इस पर उन्होंने सोचा ही नहीं। यह उनका दोष नहीं, दोष उस देश-काल और परिस्थिति का था, जिसमें स्त्रियों की आकांक्षाओं पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता था। मुहम्मद साहब ने जिसे धर्म बताया, उधर किसी का ध्यान ही नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस पुरुष का एक भी श्वास उस खुदा के नाम के बगैर खाली जाता है, उससे खुदा कयामत में वैसे ही पूछता है, जैसे किसी पापी से पाप के बदले में पूछा जाय। जिसकी सजा है हमेशा-हमेशा के लिये दोज़ख। कितने सच्चे मुसलमान हैं, जिनका एक भी श्वास खाली न जाता हो? करोड़ों में कदाचित् ही कोई हो। शेष तो सभी के श्वास खाली ही जाते हैं, जिसकी सजा वही है जो पापियों के लिये है। बताने की आवश्यकता नहीं, 'दोज़ख'। मुहम्मद ने व्यवस्था दी कि जो किसी को नहीं सताता, पशुओं को ठेस नहीं पहुँचाता, वह आकाश से खुदा की आवाज सुनता है। यह सभी स्थानों के लिये था; किन्तु पीछेवालों ने एक रास्ता निकाल लिया कि मक्का में एक मस्जिद है, जिसमें हरी घास नहीं तोड़नी चाहिये, उस मस्जिद में किसी पशु को नहीं मारना चाहिये, वहाँ किसी को ठेस नहीं पहुँचानी चाहिये और घूम-फिरकर वे उसी दायरे में खड़े हो गये। क्या खुदा की आवाज सुनने से पहले मुहम्मद ने कोई मस्जिद बनवायी थी? क्या कभी किसी मस्जिद में कोई आयत उतरी? यह मस्जिद तो उनकी स्थली रही है, जिसमें उनकी यादगार सुरक्षित है। मुहम्मद के आशय को तबरेज ने जाना था, मंसूर ने जाना था, इकबाल ने जाना था; किन्तु वे मज़हबी लोगों के शिकार बने, उन्हें यातनाएँ दी गयीं। सुकरात