भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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३८० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता है, ठीक इसी प्रकार यह आत्मा जीर्ण शरीर को छोड़कर तत्काल शरीररूपी नवीन वस्त्र को ग्रहण कर लेता है। यहाँ शरीर मात्र एक वस्त्र है और जब आत्मा ने केवल वस्त्र बदला, वह मरा नहीं, नश्वर शरीर को ही बदला है, उसकी व्यवस्थाएँ पूर्ववत् हैं तो इस भोजन (पिण्डदान), आसन, शय्या, सवारी, आवास या जल इत्यादि से किसे तृप्त किया जाता है? यही कारण है कि योगेश्वर ने इसे अज्ञान कहा। अध्याय १५/७ में इसी पर बल देते हुए कहते हैं कि यह आत्मा मेरा सनातन अंश है, स्वरूप है और मन तथा पाँचों इन्द्रियों के कार्य-कलापजन्य संस्कार को लेकर दूसरे शरीर को धारण कर लेता है और मनसहित षट् इन्द्रियों के द्वारा अगले शरीर में विषय-भोगों को भोगता है। आत्मा ने जिस शरीर को धारण किया, वहाँ भी भोग-सामग्री उपलब्ध है, फिर पिण्डदान क्यों दिया जाता है? इधर एक शरीर को छोड़ा, उधर दूसरे शरीर को धारण किया। वह सीधा उस शरीर में जाता है। बीच में कोई विराम नहीं, कोई स्थान नहीं तो हजारों पीढ़ियों के पितरों का अनादिकाल से पड़े रहना और उनकी जीविका वंश-परम्परा के हाथ निर्धारित करना तथा पिंजड़े के पक्षी की तरह उनका रुदन, पतन एक अज्ञान मात्र है। इसीलिये श्रीकृष्ण ने इसे अज्ञान कहा। पाप और पुण्य- इस प्रश्न पर समाज में अनेक भ्रान्तियाँ हैं; किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार रजोगुण से उत्पन्न यह काम और क्रोध भोगों से कभी तृप्त न होनेवाले महान् पापी हैं। अर्थात् काम ही एकमात्र पापी है। पाप का उद्गम काम है, कामनाएँ हैं। ये कामनाएँ रहती कहाँ हैं? श्रीकृष्ण ने बताया कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके वासस्थान कहे जाते हैं। जब विकार तन में नहीं, मन में ही होते हैं तो शरीर धोने से क्या होगा? श्रीकृष्ण के अनुसार इस मन की शुद्धि होती है नाम-जप से, ध्यान से, समकालीन किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष की सेवा से, उनके प्रति समर्पण से, जिसके लिये वे ४/३४ में प्रोत्साहित करते हैं कि 'तद्विद्धि प्रणिपातेन'-सेवा और प्रश्न करके उस ज्ञान को प्राप्त करो, जिससे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। अध्याय ३/१३ में उन्होंने कहा कि यज्ञ से शेष बचे अन्न को खानेवाले सन्तजन सम्पूर्ण पापों से छूट जाते हैं और जो शरीर के लिये कामना करते हैं,