भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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३८८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता भी परमश्रेय की यथार्थ विधि को सामाजिक व्यवस्था से हटाकर अलग प्रस्तुत किया। गीता मनुष्य मात्र के लिये- भगवान ने इस धर्मशास्त्र का उपदेश ‘प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते’ (गीता, १/२०)- ठीक शस्त्र-सञ्चालन के समय किया क्योंकि वह भली प्रकार जानते थे कि भौतिक संसार में कभी शान्ति और सुख होता ही नहीं। अरबों लोगों की आहुति के उपरान्त भी जो विजेता होंगे, वह भी विफल मनोरथ और अन्ततः उदास ही होंगे, इसलिये उन्होंने ऐसे शाश्वत युद्ध का परिचय गीता के माध्यम से दिया, जिसमें एक बार विजय हो जाने पर सदा रहनेवाली विजय, अनन्त विजय और अक्षय धाम है जो मानव मात्र के लिये सदैव सुलभ है, जो क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है, प्रकृति और पुरुष का संघर्ष है, अन्तःकरण में अशुभ का अन्त और शुभ परमात्मस्वरूप की प्राप्ति का साधन है। उत्तम अधिकारी के प्रति ही उन्होंने उसे व्यक्त किया। श्रीकृष्ण ने बार- बार कहा कि तुझ अतिशय प्रीति रखनेवाले भक्त के प्रति हित की इच्छा से कहता हूँ। यह अति गोपनीय है। अन्त में उन्होंने कहा- जो भक्त नहीं हो तो प्रतीक्षा करो, उसको रास्ते पर लाओ, फिर उसी के लिये कहो। यही मनुष्य मात्र के लिये यथार्थ कल्याण का एकमात्र साधन है, जिसका क्रमबद्ध वर्णन श्रीकृष्णोक्त गीता है। प्रस्तुत टीका- योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा प्रसारित श्रीमद्भगवद्गीता के आशय का यथावत् अनुवाद करने के कारण प्रस्तुत टीका का नाम ‘यथार्थ गीता’ है। यह भगवान् की अन्तस्प्रेरणा पर आधारित है। गीता अपने में पूर्ण साधन-ग्रन्थ है। सम्पूर्ण गीता में सन्देह का एक भी स्थल नहीं है। जहाँ कहीं सन्देह है, वह बौद्धिक स्तर पर इसे जाना नहीं जा सकता है, इसलिये प्रतीत होता है। अतः कहीं समझ में न आये तो किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के सान्निध्य में समझने का प्रयास करें। तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।। ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!